प्रश्न: करीब का क्या अर्थ है? वाक् में आपके साथ, केबिन में आपके साथ या जो आप हैं उसे समझना? मैं चाहता हूँ मेरा संबंध आपसे प्रेम का बने, प्रभावित करने का नहीं।
वक्ता: करीब आना क्या है? वो तो जो करीब हैं वही बता सकते हैं। और अगर बता सकने वाली चीज़ होती तो बता-बता के ही करीब कर दिया होता उन्होनें। करीब आना क्या है, उसके लक्षण अगर बता भी दिए जाएँ तो उससे कुछ विशेष लाभ होगा नहीं क्यूंकि वो बातें तो चखने की होती हैं। जिसने पाया, बस उसी ने जाना। तो मैं करीबी से विपरीत दूरी पर बात करूँगा कि दूरी क्या है? दूरी तुम बखूबी जानते हो। उस पर चर्चा हो सकती है। दूरी पर बात करते-करते हो सकता है, करीबी के बारे में कुछ बातें पता चल जाए।
अहंकार को आश्वस्ति कभी नहीं होती और अहंकार से ज़्यादा आश्वस्त कोई होना नहीं चाहता।
अहंकार लगातार तरीके खोजता है किसी बात को तय कर लेने के, पक्का कर लेने के। बात जितनी तय होती है, अहंकार को एक छोर पर बड़ा सुकून मिलता है कि बात ठीक है; मैं कुछ जान गया। मैं शांत हो सकता हूँ, मैं चैन से सो सकता हूँ। लेकिन जितनी आश्वस्ति बढ़ती जाती है, अहंकार का खौफ़ भी उतना ही बढ़ता जाता है। जैसे कि तुम किसी टूटे हुए कटोरे में पानी भरने की कोशिश कर रहे हो। जितना ज़्यादा तुम पानी उसमें डालते जाओगे, उतना ही तुम्हारी निराशा बढ़ती जाएगी क्यूंकि पानी का डालना ही तुम्हें यह सिद्ध कर देगा कि यह कटोरा तो कभी भी भरेगा नहीं। जिसने अभी थोड़ा बहुत ही पानी डाला, उसको अभी उम्मीद बंधी रहेगी। उसको ऐसा लगेगा कि अभी उस पर प्रयत्न करूँगा तो शायद यह कटोरा भर जाए। पर जिसने जितना भरा, उसे कहीं न कहीं, साफ़-साफ़ दिखता जाता है कि यह चीज़ तो भरने की नहीं है। इसका तो अंत कभी आएगा नहीं। यहाँ तो कभी चैन पाऊँगा नहीं।
आश्वस्ति का भी यही हिसाब है। तुम जितना ज़्यादा अपनी सुरक्षा बढ़ाते हो; तुम जितना ज़्यादा यह तय करने की कोशिश करते हो कि, ‘’मुझे पता है कि क्या है, मैं कौन हूँ और दुनिया कैसी है,’’ तुम जितना ज़्यादा यह तय करने की कोशिश करते हो, उतना ज़्यादा तुम्हारा खौफ़ बढ़ता जाता है कि तय करने की तमाम कोशिशों के बाद भी तुम पाते हो कि तुम्हारे भीतर दुविधा बची हुई है। तुम्हारे भीतर संशय, संदेह बचे हुए हैं। तुम्हें खुद ही प्रमाण मिलते रहते हैं। तुम अटक-अटक जाते हो। तुम ठिठक जाते हो। निर्णय लेने से पहले सोचना पड़ता है बहुत। फंस जाते हो! यह सब इसी बात के प्रमाण हैं कि तुमने जाना नहीं और अगर तुम बहुत जानकार आदमी हो, तो यह प्रमाण तुम्हें डर से निराशा से और कुंठा से भर देते हैं। तुम कहते हो अभी भी कुछ पता नहीं है मुझे। और इतना तय करने के बाद भी अगर अभी भी पक्का नहीं हुआ है, तो अब आगे के लिए भी क्या उम्मीद है!


