सुणिए हाथ होवै असगाहु
जपुजी (नितनेम)
वक्ता:जो हासिल किया नहीं जा सकता, जो बात दुष्प्राप्य है, वो भी सुनने से हाथ आ जाता है। जो तुम्हें अन्यथा कतई न मिलता, वो सुनने से मिल जाता है। क्या आशय है?
श्रोता1: सुनने से कुछ मिलेगा की जगह इसको ऐसे करें कि जो भारीपन है, वो जाता नहीं है। अगर हम ऐसे मान लें कि हर सेकंड एक ग्राम भारीपन बढ़ ही रहा है, तो जिसको हम सत्संग कहते हैं – सत्य का संग – तो उसमें आप कुछ सुनते नहीं हो, कुछ और एक ग्राम बढ़ता नहीं है और जो बाहर से आम तौर पर एक ग्राम बढ़ रहा था, वो भी नहीं बढ़ता है। तो एक तरीके की सफ़ाई होती रहती है, जिसमें कि बढ़ौत्री नहीं होती। तो वो एक तरीके से क्लीनर का काम करता है।
श्रोता 2: हमारा जो रोज़ का सुनना है, उसमें कर्ता भाव भी होता है। उसमें चयन होता है कि क्या सुनें। लेकिन असली सुनना जो होगा, वो निर्विकल्प होगा।
श्रोता3: आपने कई बार कहा है कि, ‘’साइलेंस इज़ द साउंड्स बिहाइंड आल साउंड्स। ’’



