प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप अपनी किताब में कहते हैं कि ध्यान की विधियों से कुछ नहीं होगा, लेकिन क्या कुछ देर बैठ कर अपने विचारों को देखना सही नहीं है? क्या इससे कुछ पलों का चैन नहीं मिलेगा?
आचार्य प्रशांत: सटीक उदाहरण नहीं दे रहा हूँ पर इशारा समझना। चुप-चाप बैठकर अपने विचारों को देखने की कोशिश वैसी ही है जैसे कोई ठहर कर अपनी दौड़ को देखने की कोशिश करे। अगर तुम्हें अपनी दौड़ को देखना है तो कब देखोगे? जब तुम ठहरे हुए हो या जब तुम दौड़ रहे हो? जब दौड़ रहे हो।
तुम कहते हो कि "मैं ध्यान के लिए बैठ गया।" अब तुम अपने उस रूप को देख ही नहीं पाओगे जो दौड़ रहा होता है। क्योंकि अब तो तुमने अपने-आप पर ही एक आचरण लाद दिया है न? तुमने अपने-आप को घोषित कर दिया है कि, "फिलहाल मैं क्या कर रहा हूँ? फ़िलहाल तो मैं ठहरा हुआ हूँ, फ़िलहाल तो मैं ध्यान कर रहा हूँ और इस वक़्त मुझे इधर-उधर के सत्य विरुद्ध, धर्म विरुद्ध, शील विरुद्ध विचार आने नहीं देने हैं।" तो जैसे ही तुम ध्यान करने बैठे, तुम जो हो वो कहीं जाकर छुप जाता है। मर नहीं जाता, विलुप्त नहीं हो जाता लेकिन छुप ज़रूर जाता है।
तो जिसे तुम ध्यान कहते हो, उस वक़्त तुम जिसे देखोगे भी वो तुम नहीं होओगे। वो तुम्हारा एक परिष्कृत, कृत्रिम रूप से परिष्कृत संस्करण होगा। अपने-आपको देखना हो तो तब देखो न जब तुम जी रहे हो। और जीने से मेरा अर्थ है वैसे जीना जैसे तुम अधिकांश समय जीते ही हो।
कोई कहे कि "मुझमें भक्ति कितनी है ये सिर्फ़ उस वक़्त देखो जब मैं मंदिर में खड़ा हूँ नमित होकर के।" तो इस देखने के परिणाम सही आएँगे या झूठे? अगर ये पता ही करना है कि धार्मिकता कितनी है तुममें और सत्यनिष्ठा कितनी है तुममें तो तुम्हें तब देखा जाए जब तुम तय करके मंदिर में आकर खड़े हो गए हो कि "साहब आधा घंटा मंदिर में गुज़ारना है।" या दिन के बाकी साढ़े-तेईस घंटों में देखा जाए?



