जहाँ दिखे वहाँ देखो, जहाँ न दिखे वहाँ भी देखो || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2014)

भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित् परमर्थतः।
नास्त्यभाव: स्वभावनां भावाभावविभाविनाम्।।
अष्टावक्र गीता (अध्याय १८, श्लोक ४)
अर्थ: “भाव और अभाव के माध्य स्वभाव का कभी नाश नहीं होता”
आचार्य प्रशांत: जिस सवाल का अष्टावक्र यहाँ पर जवाब दे रहें हैं, वो सवाल है कि, “क्या ‘है’?”। किसको कहा जाता है कि ‘है’? और उनका जो उत्तर है वो बड़ा सीधा-साधा है। वो कह रहें हैं: “जो दिखता है सो दिखने जैसा है, और जो दिखने का तत्व है वो तत्व जैसा है” — दोनों अपनी-अपनी जगह ‘हैं’।
तो पहले वाक्य में वो ये कहते हैं कि जो ये सब दिखाई पड़ता है, जो पूरा संसार है, वो भावना-मात्र है । वो बस एक प्रकार की प्रतीति है, विचार है। पर उसके आगे वो यही कहते हैं कि यही तो उसका होना है, और किसको कहोगे कि ‘है’?
सपना ‘है’, संसार ‘है’, यही उसका होना है। तो मिथ्या कहकर भी वो उसको मिथ्या कह नहीं रहे। वो कह रहें हैं कि संसार ‘कल्पना’ है, और आगे ये भी कहते हैं कि जानने वाले इन दोनों के होने को अलग-अलग जानते हैं। वो संसार के होने को जानते है कि उसके होने का क्या स्वभाव है, और वो परम के होने को जानते हैं कि उसके होने का क्या स्वभाव है। और क्योंकि वो दोनों का ‘होना’ जनते हैं, इसलिए, अष्टावक्र ने एक बड़ी मज़ेदार बात कही है कि कुछ भी ‘न होने जैसा’ नहीं है।





