आचार्य प्रशांत: जैसे-जैसे कुछ भी समझ में आता है, शुरुआत कहीं से भी करो, जैसे-जैसे कुछ भी समझ आएगा उस क्षेत्र के जो हिस्से हैं वो मिटते जाएँगे और एक एकीकृत करने वाली कोम्मुनालिटी सामने आती जाएगी, ये तो है ही है।
इतने सारे धूप के यहाँ छोटे-छोटे टुकड़े पड़े हुए हैं ज़मीन पर, धूप के कितने छोटे-छोटे टुकड़े दिख रहे हैं ज़मीन पर पड़े हुए हैं। जैसे-जैसे समझते जाओगे कि ये धूप क्या है, ये प्रकाश क्या है, वैसे-वैसे ये छोटे-छोटे टुकड़ों से शुरुआत करके एक सूरज तक पहुँच जाओगे। शुरुआत तो ऐसे ही करोगे कि अरे! ये टुकड़ा, वो टुकड़ा, वो टुकड़ा, असंख्य टुकड़े हैं।
अब ये टुकड़े भी पैदा क्यों होते हैं, जानते हो? ये पत्तियों के बीच में छोटे-छोटे छेद हैं। पिन-होल कैमरा पढ़ा होगा। ये सूरज है, ये धूप के टुकड़े नहीं हैं, ये सूरज है। वो जो पत्तियों के बीच में ज़रा-ज़रा सी छेद है, ज़रा-ज़रा सी दरारें हैं वो पिन होल कैमरा का काम कर रही हैं और ये पूरा-का-पूरा सूरज है जो यहाँ उतर आया है।
प्र१: सर अगर कोई बहुत ही छोटा कोई पौधा हो मैगनीट्यूड के हिसाब से तो?
आचार्य: वो भी पूरा सूरज ही उतर आता है।
प्र१: सर, उसको तो वो सूरज ही लगेगा।
आचार्य:



