प्रश्न: आत्मज्ञान कैसे हो?
वक्ता: स्पष्ट सी बात है कि जिसे जानना है, उसके करीब आना होगा। जिसे जानना है, उससे दूरी बना कर के तो कुछ जाना नहीं जा सकता। आत्मज्ञान में जिस आत्म की बात हो रही है, वो तो अहंकार ही है क्योंकि ज्ञान उसी का हो सकता है और मात्र उसी को जाना भी जा सकता है। मात्र उसी को जानकारी रूप में इकट्ठा भी किया जा सकता है। वो अपनेआप को किन रूपों में प्रकट करता है? वो अपनेआप को प्रकट करता है मानसिक रूप में और शरीरिक रूप में। वो अपनेआप को प्रकट करता है इस जगत के रूप में।
हमने दो बातें कहीं: पहली ये कि आत्मज्ञान का अर्थ ये कतई न लगाया जाए कि आप आत्मन को, ब्रह्म को, परम को जान लेंगे। वो जानने की वस्तु नहीं है। उसमें डूबा जा सकता है, उसे जाना नहीं जा सकता; वो अज्ञेय है। जो अज्ञेय हैं, उसके बारे में कुछ भी जाना नहीं जा सकता। तो आत्मज्ञान जब भी कहा जाए, तो उसका अर्थ यही है कि अहंता का ज्ञान। इस अहंता को कैसे जानना हैं?
मैंने कहा इसके अन्दर तीन कर्म होते हैं। और ये लगातार कर्म में ही उत्सुक होती है। तीन प्रकार के इसके कर्म हैं: मानसिक, शारीरिक और जगत। जगत क्या है? जगत अहंता का कर्म है। सुना है न आपने कि जैसे होते हो, दुनिया वैसी ही दिखती है। तो स्वयं को जानना है, तो दुनिया को भी देखा जा सकता है। इसमें सबसे स्थूल है , जो कुछ न कर पाता हो, उसके लिए आत्मज्ञान की शुरुआत होगी दुनिया को जानना। दुनिया कैसे चलती है, इस दुनिया के नियम-कायदे क्या हैं? इस दुनिया के सारे विज्ञान क्या हैं? इस दुनिया के सारे तंत्र कैसे चलते हैं? तो आप ज्ञान इकट्ठा कर रहे होंगे भूगोल के बारे में, भौतिकी के बारे में, अर्थ व्यवस्था के बारे में, राजनीति के बारे में लेकिन साथ ही साथ आत्मज्ञान भी मिल रहा है क्योंकि दुनिया का कोई भी तंत्र हो, कोई भी ब्यवस्था हो वो मन से ही निकली है।
मन तो एक ही है। आपने यदि ये समझा कि दुनिया भर के देश आपस में क्यों लड़ते हैं, तो आपको ये भी स्पष्ट हो रहा होगा कि दो व्यक्ति आपस में क्यों लड़ते हैं क्योंकि देशों और व्यक्तियों में कोई अंतर नहीं है। अगर आपने ये समझा कि दुनिया की अर्थ-व्यवस्थाएं कैसे चलती हैं, अमीरी कहाँ से आती है और गरीबी कहाँ आती है, तो उससे आपको अपने मन का भी बहुत कुछ पता चल जाएगा कि मन किस प्रकार धन को खींचता है। धन की कमी होने पर मन कैसे

