प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पहले मैं ध्यान करता था, लेकिन जब से नाईट शिफ्ट (रात की पाली) लगी है, समय नहीं मिल पाता। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारा कैसा ध्यान था कि ध्यान के बावजूद तुम नाईट शिफ्ट में फँस गए बेटा? ये कौन सा ध्यान था जिसने तुम्हें इतना भी नहीं सिखाया कि कहाँ काम करना चाहिए और कहाँ नहीं? ध्यान के बाद भी अगर तुम घटिया चुनाव कर लो तो तुम्हारा ध्यान भी?
प्र: घटिया होगा।
आचार्य: घटिया ही रहा होगा। ये जो नकली और बाज़ारू ध्यान होता है, उसका नतीजा यही निकलता है। ध्यान का अर्थ होता है, अपनी वृत्तियों के प्रति विद्रोह क्योंकि वृत्तियाँ ध्यान नहीं चाहतीं। वृत्तियाँ विचलन चाहती हैं। वृत्तियाँ विक्षेप चाहतीं हैं। ध्यान का अर्थ होता है अपने ही खिलाफ बगावत। ध्यान का ये मतलब थोड़े ही होता है कि ध्यान करा और उसके बाद वही सब कुछ कर रहें हैं जो जमाना कर रहा है। कहीं कोई आग नहीं, कहीं कोई विद्रोह नहीं।
तुम दस साल से एक दवाई ले रहे हो और दवाई लेने के बाद भी तुम्हारे बाल झड़ रहे हैं, तुम्हारे दाँत झड़ रहे हैं, तुम्हारी आँत भी झड़ रही है। दवाई के बारे में क्या पता चला? वो दवाई नहीं है, वो बीमारी ही है।
ध्यान जिनकी ज़िन्दगी में उतरता है वो बेख़ौफ़ हो जाते हैं। वो फिर रूढ़िगत निर्णय नहीं लेते। और कोई सर घुटाले, कोई जनेऊ पहन ले, इसको तो तुम कह देते हो कि ये रूढ़ियों का पालन कर रहा है। कह देते हो न?



