मुरली बाज उठी अणघातां । सुन के भुल्ल गईआं सभ बातां ।
लग्ग गए अनहद बान न्यारे, झूठी दुनियां कूड़ पसारे, साईं मुक्ख वेखन वणजारे, मैनूं भुल्ल गईआं सभ बातां ।
हुन मैं चैंचल मिरग फहाइआ, ओसे मैनूं बन्न्ह बहाइआ, सिरफ दुगाना इश्क पढ़ाइआ, रह गईआं त्रै चार कातां ।
बूहे आण खलोता यार, बाबल पुज्ज प्या तकरार, कलमे नाल जे रहे वेहार, नबी मुहंमद भरे सफातां ।
बुल्ल्हे शाह मैं हुन बरलाई, जद दी मुरली काहन बजाई, बावरी हो तुसां वल्ल धाई, खोजियां कित वल दसत बारतां ।
~बुल्लेशाह
वक्ता: जादू है ना, मुरली बाज उठी अनघाता| कृष्ण की मुरली हो, चाहे उपनिषदों के शब्द हों, चाहे संसार हो, सब दो तलो पर हैं| एक तो कृष्ण की मुरली वो है जो बजती है बाहर कहीं कृष्ण के होंठो पर और आवाज उसकी कान में सुनाई देती है| उसको नहीं कहोगे कि वो अनघाता बज रही है| वो तो तब बज रही है जब बाँस से हवा प्रवाहित हो रही है| एक दूसरी मुरली है जिसको बजने के लिये ना होंठ चाहिये ना बाँस, ना हवा| वो यहाँ बजती है (सर कि ओर इशारा करते हुए)| दो मुरली हैं, और पहली मुरली की सार्थकता इसी में है कि दूसरी बज उठे| बुल्लेशाह निश्चित रूप से पहली तो नहीं सुन रहे| कहाँ कृष्ण, कहाँ बुल्लेशाह, शताब्दियों का फर्क है|



