प्रश्नकर्ता: ध्यान क्या है?
आचार्य प्रशांत: ध्यान अपने आप में कुछ भी नहीं है। ध्यान को जब भी कुछ बनाया जाएगा, वो ध्यान के साथ दुर्व्यवहार ही हो जाएगा। हमारा स्वभाव है ध्यान। ध्यान कोई करने की बात नहीं है। ध्यान को ऐसा ही समझ लो कि बेहोशी में ना रहना।
अ-ध्यान से आसक्त ना होना ही ध्यान है।
ध्यान करने की कोशिश तुम्हें अ-ध्यान में ले जाएगी। ध्यान का नाम भी तुम्हें ध्यान से विचलित कर देगा। ध्यान स्वभाव है, और स्वभाव को अगर पाने की चेष्टा करोगे तो हाथ सिर्फ चेष्टा रह जाएगी। ध्यान का अर्थ है ‘उसको’ अपने सामने, अपने भीतर, अपने आधार में, मौजूद पाना – जो सच है, जो है। (अटेंशन- टू अटेंड टू) अटेंडेंट कौन होता है? सेवक।
तो ध्यान का मतलब हुआ निरंतर तुम्हारे मन में अपने से किसी के ऊपर होने का भाव मौजूद रहे। मन कभी इतना दुराग्रही ना हो जाए कि अपने-आप को सेवक से ऊपर कुछ और समझ ले। मन हमेशा किसी एक के सामने झुका हुआ रहे। और वो जो कोई एक है वो मन की कोई कल्पित वस्तु, विचार नहीं हो सकता। क्योंकि अगर मन अपनी ही किसी कल्पित इकाई के सामने झुका, तो फिर अपने ही सामने झुका यानि कि झुका ही नहीं। तो मन को यदि झुकना है तो मन को किसी बाहर वाले के सामने झुकना पड़ेगा – इस का नाम ध्यान है।
मन निरन्तर झुका हुआ रहे, ध्यान और श्रद्धा एक है। ध्यान मार्ग, भक्ति मार्ग जिनको दो अलग-अलग कह कर के खूब बातें करी गयी हैं; एक हैं।



