


कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
"तो कुल क्षय से होने वाले दोष को देख-सुन कर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?"

भई! गर्मी का मौसम हो, तुम शरीर खुला रखो बात समझ में आती है। तुम कहीं नदी में, स्विमिंग पूल (तरणताल) में नहाने जा रहे हो, तुम कपड़े उतार दो, बात समझ में आती है। या तुम सिर्फ़ अपनी सुविधा के लिए कम कपड़े पहनो तो भी बात समझ में…

ऐसा तो नहीं है कि दस-बारह साल के बच्चे को अगर आप रामकृष्ण की बोध कथाएँ पढ़ाएँगे तो उसे समझ में नहीं आने वाली। आएँगी न। आपके घरों में क्यों नहीं है रामकृष्ण परमहंस की सरल साधारण कथाओं की किताब? कृष्णमूर्ति साहब का साहित्य आता है ‘*कृष्णमूर्ति फॉर द यंग*’।…

छोटे आदमी की सज़ा ये कि उसकी ज़िंदगी में सब छोटे-छोटे मुद्दे होंगे। यही मुद्दा होगा कि इतने से इतने बजे तक पानी आता है, पोछा लगाया कि नहीं लगाया, भैंस का दूध लेना है कि गाय का दूध लेना है, नौकरी में फलाने को नीचा कैसे दिखाना है, ऊपर…

तुम्हें बर्बाद करने में एक चीज़ का सबसे बड़ा योगदान रहा है तो वो है – फिल्में और *टीवी*।
तुम्हें पता भी नहीं है जिनको तुम अपने विचार कहते हो वो वास्तव में फ़िल्मी विचार हैं। जिनको तुम अपनी भावनाएँ बोलते हो वो वास्तव में फ़िल्मों ने दी हैं तुमको।…

तुलना तो तुम्हें करनी ही है; इनसे क्या तुलना कर रहे हो, अपने दफ़्तर के लोगों से तुलना करते हो, वो सब तुम्हारे ही जैसे हैं।
ये क्या तुलना कर रहे हो कि, “मेरे पास आल्टो है, दूसरे के पास डिज़ायर है”, कि, “मेरे पास डिज़ायर है और दूसरे के…

अपने-आपको देखकर यह ना कहा करो, “आह, हा, हा! क्या बात है! मैं ही तो हूँ सरताज, सिकंदर!” और कोई तुम्हारे बारे में धोखे में रह जाए तो रह जाए, तुम अपने बारे में कैसे धोखे में हो? तुम अपनी हरक़तें नहीं जानते? तुम अपने विचार नहीं जानते? तुम नहीं…

आचार्य प्रशांत: अभी हालत ये है, खासतौर पर जो वर्तमान पीढ़ी है उसकी, कि उसमे ज़्यादातर लड़के लड़कियों को अपने ही नाम का मतलब नहीं पता होता। अगर हमें इस बात से असुविधा हो रही होती कि हम कोई चीज़ नहीं जानते हैं तो हमें सबसे पहले किस चीज़ से…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, थोड़े समय के लिए हम लोग पूरी तत्परता के साथ और ईमानदारी के साथ कुछ कर रहे होते हैं, और साथ-साथ ये भी होता है कि ज्ञान भी कम होता है और क्षमता भी कम होती है, तो प्रक्रिया धीमी होती है और फिर ऐसा भी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्कार! पिछले दो दिन से उपनिषद समागम के दौरान जो मन में प्रश्न उठ रहे थे वो एकदम सामान्य प्रश्न थे जो आम ज़िन्दगी से संबंधित होते हैं। एक तरह से वे बनावटी प्रश्न थे। उन प्रश्नों पर गौर से ध्यान देने भर से वे भंग हो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब सत्य/चेतना चुनाव करते हैं तो विवेक क्या है? चेतना और सत्य क्या भिन्न हैं? जब हम अध्यात्म की पहली सीढ़ी चढ़ते हैं, तो क्या विवेक ही नहीं है जो बढ़ता है? कृपया समझाएं?
आचार्य प्रशांत: हमारी चेतना, अशुद्ध चेतना होती है। उसका लक्ष्य होता है- सत्य।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज दोपहर में बुल्लेशाह जी की काफ़ियाँ गा रहे थें, और गाते-गाते हम बहुत रम गए, और मन बहुत शुद्ध होता सा महसूस हुआ; और जब से यहाँ पर हैं तब भी बहुत मन शुद्धता महसूस करता है। तो एक बात, जब अवलोकन लिख रहे थे, तो…

आचार्य प्रशांत: कौन से श्लोक हैं, जिसपर बात करें?
प्रश्नकर्ता: पहला खण्ड, पाँचवा श्लोक, केनोपनिषद।
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मानसिकता (मेंटालिटी) का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: मानसिकता का अर्थ होता है- सोचने का एक बंधा हुआ तरीका। मानसिकता का क्या अर्थ होता है? सोचने का एक बंधा हुआ तरीका। मानसिकता कोई भी हो गलत है क्योंकि मानसिकता का अर्थ है कि मन मुक्त नहीं है।…

प्रश्नकर्ता: जब मेरे दिमाग में कोई भी विचार आता है, थॉट आता है, मुझे खुद भी नहीं पता होता कि मैं क्यों सोच रहा हूँ यह सब। जब भी मैं कोई काम करने जा रहा होता हूँ या पढ़ रहा होता हूँ, वह मेरे को फ़ोकस नहीं करने देता, कंसंट्रेशन…

यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।
यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥
(केनोपनिषद, अध्याय 2, श्लोक 1)

प्रश्न: आचार्य जी, हमसे कहा जाता है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है। लेकिन सारे शैतान तो भरे दिमाग में ही घूमते रहते हैं। और यह ‘खाली दिमाग’ होता भी कैसे है? क्या किसी ने कभी ‘खाली दिमाग’ का अनुभव किया भी होगा? क्या साधक ऐसा करते हैं?…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वृत्तियों का ज़ोर दिखता है। क्या इनका दमन करके बदलना चाहिए, या देखना मात्र पर्याप्त है?
आचार्य प्रशांत: देखो, अगर बदल दोगे, तो आंशिक सुधार मिलेगा। क्योंकि बदलकर भी तुम कौन-सा विचार अपने ज़हन में लाओगे?

प्रश्न: आचार्य जी, सत्संग के बावजूद भी मन में गलत ख्याल क्यों आते हैं?
आचार्य प्रशांत जी: अभी जो सवाल पूछ रहे हो, क्या ये सवाल भी गलत विचार से आ रहा है? अभी मेरे सामने बैठे हो, क्या ठीक इस वक़्त भी मन हावी है? ठीक अभी क्या मन…

प्रश्न: आचार्य जी, क्या सपनों में गुरुदर्शन का महत्त्व है?
आजकल कई बार ऐसा हो रहा है कि मेरे गुरुजी सपनों में आ रहे हैं। उनके द्वारा कही गयी बात सुनाई तो देती है, महसूस भी होती है, पर मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि वो कहना क्या…

श्रोता: आपने अभी कहा कि प्रपात को देख कर हमें ‘उसकी’ याद आ जाती है। पर किसी चीज़ की याद आने से पहले ज़रूरी है कि वो चीज़ हमें पहले से ही पता हो। तो क्या हमें पता है पहले से ही सत्य के बारे में? हमें तो अभी…

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥
– कबीर

वक्ता: नवनीत(श्रोता को इंगित करते हुए) पूछ रहे हैं कि हमारे कर्म हमारे विचारों से निकलते हैं। मुझे लगता है इस बात से तो हम सभी सहमत होंगे। सही है?
पर यह हम नहीं समझ पाते कि विचार आते कहाँ से हैं? विचार कहाँ से आते हैं, नवनीत?श्रोता…

प्रश्न: सर, ये बात तो पक्की ही है कि हम दूसरों की इसलिए सुनते हैं, 100 आदमियों की इसलिए सुनते हैं क्यूँकी हम ख़ुद जान नहीं पाते। हम जानने से मना कर देते हैं, हम जान नहीं पाते। तो कैसे हम किसी भी चीज़ को जाने?
वक्ता: कुछ भी कैसे…

श्री प्रशान्त: विचार बाहर से आते हैं। निर्णय बाहर से आते हैं। और अंतर्भाव भी बाहर से ही आते हैं। हाँ, विचार सचेत होता है, दिखाई पड़ता है। पर अंतर्भाव का हमें पता ही नहीं चलता कि वो कहाँ से आ रहा है। तो हमें ऐसा लगता है कि शायद…

प्रश्न: सर, जैसे-जैसे बड़े होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे उलझनें बढ़ती जा रही हैं। सर, पैसों की दिक्कत होया कुछ और प्रॉब्लम हो, जैसे-जैसे बड़े होते जा रहे हैं, परेशानियाँ और बढ़ती चली जा रही हैं। तो ऐसा क्या है, जो अब होने लगा है, जो पाँच साल पहले…

श्रोता: सर, कहीं ऐसा पढ़ा था कि एक दिन में 60,000 से ज्यादा विचार मन में आते हैं और इसमें कुछ विचार सकारात्मक होते हैं और कुछ नकारात्मक भी होते हैं । तो मुझे ये जानना है कि नकारात्मक विचारों पर कैसे काबू किया जाए?
वक्ता: (व्यंग्य कसते हुए) “मीठा-मीठा…

प्रश्न: निम्न विचार और उच्च विचार क्या हैं?
वक्ता: हम में से कितने लोगों को ये सवाल अपने सन्दर्भ में उचित लग रहा है? कितने लोगों को ये सवाल संबद्ध लग रहा है? कितने लोग उत्सुक हैं इसका उत्तर जानने को?

प्रश्न: सर, आपने कहा कि समझ आ जाए, तो जीवन में सोचने-विचारने की आवश्यकता कम हो जाती है| पर क्या समझ विकसित करने के लिए सोचने-विचारने की आवश्यकता नहीं है? क्या सोचने-विचारने का जीवन में महत्व है?
वक्ता: सोचने का जीवन में महत्व है, पर यह महत्व तभी तक है,…

प्रश्न: सर, मैं पूछना चाहता हूँ कि एक इंसान की ज़िन्दगी में भावनाओं का किस तरह से असर होता है? भावनाएँ बहुत तरीके की हो सकती हैं| दोस्त के प्रति, माँ-बाप के प्रति| या अगर आप कुछ करना चाहते हैं तो उस उद्देश्य के प्रति आपका व्यवहार कैसा रहता है|…

प्रश्न: अभी हम लोग कार में आ रहे थे तो उसमें ओशो के वचन चल रहे थे। उसमें उन्होंने कहा कि जब आप कभी ज़्यादा सोचते हो, तो आप कहीं नहीं पहुँच पाते। आप जब भी किसी चीज़ को बहुत ज़्यादा सोचोगे, तो आप किसी भी दिशा में आगे कहीं…

वक्ता: तुमने कहा कि अगर मैं यहां बैठा भी हूं, तो कुछ सोच रहा हूं; अतीत का। और मुझे लग रहा है कि यदि ऐसा ना किया होता, तो अभी जो होता है, अभी जो रहा है, वो थोड़ा अलग होता। है ना? तो तुम कह रहे हो कि अभी…



Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…



पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”

“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे, उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप चिकन से लेते हैं तो लगता हैं १ रुपया।








प्रश्नकर्ता: अभी आप कह रहे थे कि श्रीकृष्ण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और बाकी सब लोग अपने बारे में बोले जा रहे हैं। तो क्या इसका सम्बन्ध इससे है कि श्रीकृष्ण का कर्मफल और प्रारब्ध कट चुका है लेकिन बाकी सभी का कर्मफल और प्रारब्ध अभी जारी

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"
भारतीयों को शायद यह लगता है कि हिंदुस्तान से बाहर जहाँ कहीं कोई मिलेगा वह ‘अंग्रेज़ी’ ही बोल रहा होगा। एक तो यह बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है – बाहर जैसे ही हम निकलेंगे वैसे ही जो मिल रहा होगा अंग्रेज़ी ही बोल रहा होगा। हिंदुस्तान बेचारा बस पिछड़ा हुआ है,…
आचार्य प्रशांत: इसी आशय के तर्क आगे भी…
(केनोपनिषद, खण्ड १, श्लोक ५)
हिंदी अनुवाद: मन से जिसका मन नहीं किया जा सकता; अपितु मन जिसकी महत्ता से मनन करता है, उसी…
प्रश्नकर्ता: जैसे कहा गया था की मैं…
आचार्य:
तो तुम्हारा मन किसी दिशा में भाग…
ठीक है। इसका मतलब…
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15
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प्रश्नकर्ता: कृष्ण अध्याय नौ में बताते हैं कि वे सब भूतों में समभाव से व्यक्त हैं, वहीं अध्याय दस में बताते हैं कि जो कुछ भी विभूतियुक्त, कांतियुक्त और शक्ति युक्त है, वो कृष्ण की अभिव्यक्ति है। अध्याय नौ में कृष्ण कहते हैं कि ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद मैं ही हूँ…
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।।
जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है, वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९
प्रश्नकर्ता: जब…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। आज का सबसे पहला प्रश्न जो है वह सनातन के ऊपर है कि सनातन माने क्या? और ऐसा क्या है जिसको वास्तविक रूप में सनातन कहा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, सनातन का अर्थ होता है वो जो काल की सीमाओं से के बाहर का हो।…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अर्जुन कहते हैं कृष्ण से कि ‘धृतराष्ट्र पुत्र चाहे मुझे मार भी दें तो भी उनसे लड़ना तो ग़लत ही है।‘ हमारे आम जीवन में भी ऐसे ही चलता रहता है कि हम इमोशनल ब्लैकमेल (भावनाओं से किसी को नियंत्रित करना) करते हैं बहुत बार, या…
प्रश्नकर्ता: कुछ दिन पहले आपने एक उदाहरण दिया था, एम एच ३७० का, कि हम जो खोज रहे हैं वो हमें कहीं मिल नहीं रहा इसलिए यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड) इतना बड़ा है कि लगातार हम खोजते जा रहे हैं। तो स्पेस (स्थान) की तो बात उससे समझ में आ रही है।…
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०
आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के…