आचार्य प्रशांत: अभी हालत ये है, खासतौर पर जो वर्तमान पीढ़ी है उसकी, कि उसमे ज़्यादातर लड़के लड़कियों को अपने ही नाम का मतलब नहीं पता होता। अगर हमें इस बात से असुविधा हो रही होती कि हम कोई चीज़ नहीं जानते हैं तो हमें सबसे पहले किस चीज़ से असुविधा होती? हमें सबसे पहले तो अपने ही नाम से असुविधा हो जाती न। पर नहीं; जैसे हम अपने नाम को नहीं जानते न, वैसे ही हम अपने-आपको, अपने मन को भी नहीं जानते। पर हम ये जो देह है इसके साथ अपने पहले दिन से हैं। या ये कह दो हम अपना पहला दिन गिनते ही उसको हैं जिस दिन ये देह आई थी। तो रिश्ता पुराना हो गया है। इस पुरानेपन के कारण हमें ऐसा लगता है कि हम इसको जानते हैं।
एक बार को अपने भीतर से इस अंधविश्वास को हटाओ कि आपको कुछ भी पता है। पहले बड़ी भयानक सी अनुभूति होगी, लेकिन उसके बाद बड़ा हल्कापन आएगा। पहले तो डर जाओगे, खौफ़ आ जाएगा, कि "हाय राम! मुझे तो कुछ भी नहीं पता।" वास्तव में कुछ नहीं पता। मूर्खतापूर्ण आत्मविश्वास है बस ये कि, "मुझे कुछ भी पता है।" उसको हटाओ तो पहले डर लगता है, लेकिन उसके बाद बड़ा हल्कापन होता है। कुछ ना जानने में जैसी मौज है, वैसी जानने में तो बिलकुल ही नहीं है। जानना तो व्यर्थ का बोझ है। पहली बात बोझ है, दूसरी बात व्यर्थ का है। व्यर्थ का इसलिए क्योंकि तुमने ऐसी चीज़ का बोझ लिया है जो तुम्हारे काम नहीं आनी। क्योंकि उसका कोई मूल्य नहीं है। क्योंकि तुम वास्तव में कुछ नहीं जानते हो। बस जानने का अभिनय करते हो। खुद को जताते हो जैसे कुछ पता है। बात समझ में आ रही है?
तो अब मूल प्रश्न पर फिर से आते हैं; ये ब्रह्म रूपी नौका से भवसागर पार करने का क्या मतलब है?
चलो वेदांत पर आओ, उपनिषदों के साथ हैं भई। जहाँ कहीं भी फँस जाया करो, याद रखा करो। दो ही तीन हैं और उन दो-तीन में भी असली एक है। दो-तीन हैं, उन दो-तीन में उस एक के अलावा बाकी दोनों जो हैं, उनको क्या हो जाना है? उस एक में प्रविष्ट हो जाना है, मिल जाना है, मिट जाना है। और जब दो-तीन नहीं बचते, एक ही बचता है तो उस एक को भी हम कहते हैं, "एक क्या कहें तुझे?" तो उसको भी हम कह देते हैं कि बस अस्ति, है। कैसे कह दें कि एक है कि शून्य है कि कितना है? बस है।




