प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज दोपहर में बुल्लेशाह जी की काफ़ियाँ गा रहे थें, और गाते-गाते हम बहुत रम गए, और मन बहुत शुद्ध होता सा महसूस हुआ; और जब से यहाँ पर हैं तब भी बहुत मन शुद्धता महसूस करता है। तो एक बात, जब अवलोकन लिख रहे थे, तो ये प्रश्न उठ रहा था बार-बार, कि अभी तक मुझे यह समझ में आया कि हम अगर शरीर को महत्वता देते हैं तो जो मन है वो शरीर की ही इन्द्रियों से बना है; और मन शुद्ध होने के लिए भी तैयार है, और मन ही अशुद्ध हो जाता है। तो मुझे मन की गलती वहां पर दिखाई नहीं दे रही थी। मतलब मुझे यह समझ में आ रहा था कि मन तो तैयार है, शुद्ध होने के लिए भी और अशुद्ध होने के लिए भी; तो कौन है जो मन को अनुमति देता है, शुद्ध होने के लिए और अशुद्ध होने के लिए?
आचार्य प्रशांत: मन को फिर अनुमति इत्यादि नहीं दी जाती न, ऐसे कहलो की, अशुद्ध मन किसका होता है और शुद्ध मन किसका होता है। जब तुम कह रहे हो मन ये होने को भी तैयार है, मन वो होने को भी तैयार है; तो वस्तुतः तुम कह रहे हो की मन की तैयारी किसी भी ओर की नहीं है; मन निरपेक्ष है। अर्थात मन की अपनी कोई निजी इच्छा या सत्ता ही नहीं है। मन किसी का अनुगामी है, मन किसी की छाया है, ये कह रहे हो तुम। तो जैसे छाया इधर भी जाने को तैयार होती है, और उधर भी जाने को तैयार होती है, तो वैसे ही तुम कह रहे हो की मन है; इधर भी जा सकता है, उधर भी जा सकता है। छाया अगर दाएँ जा रही है इसका क्या मतलब है? तुम्हारी छाया अगर दाएँ जा रही है तो इसका मतलब क्या है? तुम दाएँ जा रहे हो। तुम्हारी छाया अगर बाएँ जा रही है तो इसका क्या अर्थ है? तुम बाएँ जा रहें है, ठीक। मन अगर शुद्धि की ओर जा रहा है तो इसका क्या अर्थ है? हम शुद्धि की ओर जा रहे है। मन अशुद्धि की ओर जा रहा है तो क्या अर्थ है? हम अशुद्धि की ओर जा रहे है।
मन अहं की छाया है।
तुम अपने आप को जैसे परिभाषित करोगे, तुम अपनी जो मान्यता रखोगे; मन वैसा ही हो जाएगा। द्वैत में जीतें हैं हम, द्वैत माने- 'दो', अहं और संसार। मन क्या? जिसमें संसार है। तो अहं और संसार का द्वैत ऐसा है, जैसे कोई वृत्त और उसका केंद्र, 'दो' हुए न? एक हुआ केंद्र, और दूसरा हुआ वृत्त का क्षेत्र, ठीक? ये द्वैत ऐसा नहीं है जैसे किसी चुम्बक के दो ध्रुव होते हैं। ये द्वैत हैं। वृत्त का केंद्र, पहला ध्रुव; और वृत्त का फैलाव, पसार, क्षेत्रफल - दूसरा ध्रुव। वृत्त का केंद्र और वृत्त का क्षेत्र। केंद्र का क्या नाम है? अहं। और उस अहं के इर्द-गिर्द फिर जो पूरा संसार बन जाता है उसका क्या नाम है? मन। तो मन को निर्धारित कौन करता है? अहं।



