यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।
यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥
(केनोपनिषद, अध्याय 2, श्लोक 1)
जिसने भी ये सोच लिया कि वो जानता है, उसके लिए ये बात तय है कि वो नहीं जानता।
प्रश्नकर्ता: जैसे कहा गया था की मैं जनता हूँ कि मैं कुछ नहीं जनता।
आचार्य प्रशांत: सुकरात ने कहा है ये। पर जानने वालों ने सुकरात को भी कहा है कि तुम्हें इतना भी कैसे पता कि तुम्हें नहीं पता। एक गहरी विनम्रता चाहिए ये कहने के लिए कि कुछ ऐसा है, कुछ है जरूर, और जो मैं ही हूं, पर जिसे जानने का उपकरण मन नहीं है, जो हुआ जा सकता है, पर जिसको मानसिक तौर से जाना नहीं जा सकता, जिसको जिया जा सकता है, जो मैं हूं ही, मेरी होना। 'हुआ जा सकता है' पर जिस को मानसिक तौर से न जाना जा सकता है, ना व्यक्त किया जा सकता है। थोड़े-बहुत इशारे डाल दिए जाए वो अलग बात है।
प्र: ऐसा क्यों है?




