मन की दौड़ ही मन का बंधन है || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥
– कबीर
वक्ता: मन से ज्यादा कहीं पहुँचने को कोई आतुर नहीं होता और मन से ज्यादा पहुँचने से कोई डरता नहीं है। बड़ी गहरी बेचैनी रहती है मन की, कि किसी भी तरिके से पहुँच ही जाऊं।
‘मन का होना ही एक दौड़ है’ और व्यर्थ ही नहीं दौड़ रहा, उसे वास्तव में पहुंचना है; वो बेचैन है, उसकी बेचैनी झूठी नहीं है लेकिन मन का दौड़ना वैसा ही है, जैसे कोई इस कमरे के भीतर-भीतर दौड़ता रहे और उम्मीद उसने ये बाँध रखी हो कि वो कहीं पहुँच जाएगा। उसकी कोशिशों में कमी नहीं है, बस उसके पास डर है, दीवारें हैं और श्रद्धाहीनता है। खूब दौड़ता है, खूब मेहनत करता है; श्रमिक है मन लेकिन ये हिम्मत नहीं कर पाता है कि तोड़ ही दे दीवारें।
क्या है मन की दीवारें? ध्यान से समझियेगा मन की दौड़ ही, मन का घेरा ही, मन की दीवारें हैं; किसी और दीवार में नहीं कैद है मन, मन जहाँ तक जाता है, दौड़-दौड़ कर वहीं मन की दीवार है, उसके आगे नहीं जा पाता वो, कोई बाहरी दीवार नहीं है जो मन को रोक रही है। तुम दौड़ना शुरू करते हो और जहाँ तक जा-जा के तुम लौट आते हो, वही तो तुम्हारी दीवार है। कोई बाहरी दीवार है ही नहीं, जिसको तुम पार नहीं कर पा रहे हो, जहाँ तक तुम जाते हो और अटक-अटक जाते हो, वही तुम्हारी दीवार है।





