प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वृत्तियों का ज़ोर दिखता है। क्या इनका दमन करके बदलना चाहिए, या देखना मात्र पर्याप्त है?
आचार्य प्रशांत: देखो, अगर बदल दोगे, तो आंशिक सुधार मिलेगा। क्योंकि बदलकर भी तुम कौन-सा विचार अपने ज़हन में लाओगे?
प्र: उसका विपरीत।
आचार्य:
तो तुम्हारा मन किसी दिशा में भाग रहा है, तुम मन की दिशा को परिवर्तन देना चाहो या उलट देना चाहो, इससे अगर तुमको लाभ होगा भी तो आंशिक होगा। मात्र दर्शन, विशुद्ध अवलोकन, आंशिक लाभ से कहीं ज़्यादा लाभ देता है।
बस उसमें थोड़ा ख़तरा होता है। जब तुम एक अनचाहे विचार को, एक प्रिय विचार की ओर पलटते हो, तो तुम्हें सुख मिलता है और सुरक्षा मिलती है। तुम्हें कोई विचार उठ रहा था, जिसको तुम कहते हो ‘कुविचार’, और उसका पता लगते ही तुमने उसको बना दिया ‘सुविचार’। तुम्हें सुख भी मिलेगा, तुम्हें गौरव भी प्रतीत होगा, और तुम्हें सुरक्षा भी रहेगी।
सुरक्षा इसीलिए रहेगी, क्योंकि ये ‘सुविचार’ जाना-पहचाना है। कुछ नया नहीं घट रहा। ‘कुविचार’ का क्षेत्र भी जाना पहचाना है, और ‘सुविचार’ का क्षेत्र भी जाना पहचाना है। है या नहीं है? क्या हम पहले से ये नहीं जानते हैं कि किन विचारों को ‘कुविचार’ कहना है, और किन विचारों को ‘सुविचार’ कहना है?



