प्रश्न: अभी हम लोग कार में आ रहे थे तो उसमें ओशो के वचन चल रहे थे। उसमें उन्होंने कहा कि जब आप कभी ज़्यादा सोचते हो, तो आप कहीं नहीं पहुँच पाते। आप जब भी किसी चीज़ को बहुत ज़्यादा सोचोगे, तो आप किसी भी दिशा में आगे कहीं जा नहीं पाओगे। ऐसा कैसे?
वक्ता: देखो सोचने-सोचने में अंतर है। एक सोचना ये है कि, समझना है यहाँ पर इस बात को। हम यहाँ बैठे हैं, कोई आफत आ गई। मुझे पक्का है कि मेरा कुछ बिगड़ नहीं सकता, लेकिन अब आफत आयी है तो सोचना पड़ेगा कि इसका करना क्या है। पाँच विकल्प हो सकते हैं, थोड़ी जानकारी चाहिये होगी, किसी से बात करनी पड़ सकती है, दो-चार फ़ोन घुमाने पड़ सकते हैं। पर इस पूरी प्रक्रिया में मेरे भीतर ये श्रद्धा पूरी है कि कुछ बिगड़ नहीं सकता। मैं कर तो रहा हूँ, मैं सोच भी रहा हूँ कि अब अगला कर्म क्या होना चाहिए, मैं ये सब कर तो रहा हूँ, लेकिन ये सब करते हुए भी मुझे पता है कि मेरी जीत निश्चित है। एक ये सोचना है। यहाँ आपको ये गहरा से गहरा विश्वास है कि मैं सुरक्षित हूँ, मेरा कुछ बिगड़ नहीं सकता है। एक दूसरा सोचना है। आफ़त आई और मैं पूरा हिल गया। और अब मैं सोच रहा हूँ कि मेरा क्या होगा, कि मुझे कौन बचायेगा।
सोचने-सोचने में अंतर है। केंद्र पर स्थित रहकर सोचा जाता है, वो एक सोचना है। उस सोचने में कोई तनाव नहीं है। तुम श्रद्धा में बैठे हो, फिर सोच रहे हो। आश्वस्ति पूरी है, पहले से ही है। दूसरा सोचना श्रद्धाहीन सोचना है ।
श्रोता १: फ़िक्र है।
वक्ता: नहीं ‘फ़िक्र’ तो बहुत अच्छा शब्द है। ‘फ़िक्र’ तो सूफ़ी शब्द है।
श्रोता २:



