श्रोता: आपने अभी कहा कि प्रपात को देख कर हमें ‘उसकी’ याद आ जाती है। पर किसी चीज़ की याद आने से पहले ज़रूरी है कि वो चीज़ हमें पहले से ही पता हो। तो क्या हमें पता है पहले से ही सत्य के बारे में? हमें तो अभी ये पता ही नहीं कि हमें पता है।
वक्ता: आप जिस अर्थ में कहते हैं कि पता है उस अर्थ में नहीं पता होता। किसी पेड़ से यदि आप पूछें कि, ‘तू हरा है क्या?’ तो उसे न पता होगा। प्रपात से यदि आप पूछें कि, ‘ठीक कितने वेग से तू गिर रहा है?’ तो उसे ना पता होगा। आप के लिए पता होने का अर्थ है शब्द, अंक, मात्राएँ, संख्याएँ, धारणाएं। अब इन तरीकों से तो आपको परमात्मा का पता न चलेगा।
आप कब कहते हैं कि आपको कुछ पता है? पता होने का अर्थ ही आपके लिए ये है कि कोई मानसिक चीज़ होनी चाहिए। कुछ ऐसा होना चाहिए, जिसको शब्दों में अभिव्यक्त किया जा सके अन्यथा आप मानते ही नहीं कि आपको पता है। और बड़ी साधारण सी बात है, आप किसी को कहेंगे कि, ‘’मुझे पता है,’’ तो वो कहेगा बताओ? आप कहेंगे कि, ‘’पता है पर बता नहीं सकते।‘’ तो कहेगा तुम्हें पता ही नहीं है। हमारे लिए पता होने की पहचान ही यही है कि जो मुख से बता सकें।
सत्य *पता सबको है पर बोला नहीं जा सकता।*
और चूंकि आपने ये मान लिया है कि जो बोला जाए वही भर पता है, इसलिए आपको ये भ्रम होने लग गया है कि मुझे पता नहीं है। दूसरीं चीज़ें आपको बहुत सारी पता हैं, और दूसरीं चीज़ें ही पता हो सकतीं है। आप सत्य को भी उसी श्रेणी में, उसी तल पर ले आना चाहते हैं। आप कहते हैं, जैसे ‘’मुझे दूसरीं चीज़ें पता हैं, वैसे मुझे सत्य भी पता हो।‘’ सत्य वैसे नहीं पता चलेगा।


