
ज़िन्दगी में पहले कुछ बन जाओ, कोई आंतरिक मक़ाम हासिल कर लो, फिर तुम्हें समझ में आएगा न कि रिश्ता किससे बनाना है। अब रिश्ता बना लिए छब्बीस की उमर में – तुम्हारा लक्ष्य हो सकता है जीवन में ऊपर उठना हो, जिससे तुमने रिश्ता बना लिया है उसे ना…

कोई साधारण कद-काठी का आदमी हो, और वो चला जा रहा है, और पीछे से कोई आवाज़ दे उसे, “ओ मोटे!” इस आदमी का दिल टूट जाएगा? इसका दिल टूट जाएगा? और दूसरी और हो कि सवा-सौ किलो का वो किसी तरह लुढ़कता-पुड़कता चला जा रहा हो, और पीछे से…

खाली समय मिला है तो क्या करना है? “चल न! मोहल्ला घूम कर आते हैं, बाज़ार देखकर आते हैं”, या कहीं नहीं जाना तो, “चल न, टीवी देखते हैं।“ ख़ुद को नहीं देखना है!
अपनी हालत क्या है, उससे बिलकुल बचकर रहना है। अपनी हालत का कुछ पता नहीं, टीवी…

प्रश्नकर्ता: क्या ऐसा जीवन सम्भव है जिसमें मान्यताओं का कोई भी स्थान ना हो? ना अपने बारे में कोई मान्यता और ना ही दूसरों के बारे में। मैं छवियों में जीती हूँ। ऐसा लगता है जैसे जीवन जीने के लिए, लोगों को परखने के लिए मेरे पास आँखें नहीं हैं,…

प्रश्नकर्ता: आपकी वीडियो (चलचित्र) लगातार सुनने के बाद एक बात जो मेरी समझ में उतरी है वो ये है कि हमें हर वक़्त पता होता है कि सही कर्म क्या है, और उसके बावजूद भी जो ग़लत कर्म होता है उसका चुनाव हम अक्सर कर लेते हैं। आचार्य जी, मेरे…

प्रश्नकर्ता: आपके हिसाब से एक साधक को या जो इस रास्ते पर चल रहा है, उसको क्या करना चाहिए? उसका क्या कर्तव्य होना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: पूछने की बात ही नहीं है, बात तुम्हारे अपने अनुभव की है। दिन भर जो अनुभव हो रहे हैं, क्या जानते नहीं हो वो…

आचार्य प्रशांत (आचार्य): जब हम रत्न की बात कर रहे होते हैं और उसकी सफ़ाई करनी है क्योंकि वो मिट्टी में पड़ा था, मैला हो गया है, कीचड़ जम गया है, तो हम कीचड़ की बात ऐसे करते हैं जैसे कि वो कोई बात करने लायक चीज़ ही नहीं है,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अपने जीवन को तभी देख पाती हूँ जब मन स्थिर रहता है। लगातार भागते हुए मन के मध्य अपना जीवन कैसे देखूँ?
आचार्य प्रशांत: थमना पड़ेगा। अभ्यास की बात है। नया-नया बल्लेबाज़ होता है, बहुत तेज़ी से यदि उसकी ओर गेंद आ रही होती है तो नहीं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी जीवन को जानना क्यों ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत: एकदम ज़रूरी नहीं है!
प्र: लेकिन मैंने यूट्यूब और कहीं-कहीं से देखकर कई बार जानने की कोशिश किया कि ये शरीर नहीं है, मन नहीं है, विचार नहीं है और उसके बाद फ़िर अटक जाता हूँ।

धर्म का मतलब होता है वह धारणा रखना, जो तुम्हें समस्त धारणाओं से मुक्ति दे दे। तुमने अपने ऊपर यह जितने भी नाम रखे हैं जितने भी किरदार रखे हैं। कहा न अभी- माँ हूँ, बहन हूँ, पत्नी हूँ। यह धारणाएं हैं। जब तुम सो जाते हो तो क्या तुम…

प्रश्नकर्ता: रुमी की कोट्स(उक्तियाँ) पढ़ रहे थे।
आचार्य प्रशांत: रुमी के कोट्स, बताओ एक-आधे कोट्स।
प्रश्नकर्ता: “इफ यू डिजायर हीलिंग लेट् योरसेल्फ फॉल इल्ल” (यदि आप उपचार की इच्छा रखते हैं तो अपने आपको बीमार होने दें)

प्रश्नकर्ता: परमात्मा और हम, उसके बीच में अहंकार है। उस अहंकार की वजह से हम परमात्मा से मिल नहीं पाते। तो अहंकार मिटाने के लिए क्या करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: आपने पहले जो बोला, आप उस बारे में पूरी तरह आश्वस्त हैं क्या? – “परमात्मा और हम, और बीच में…

प्रश्नकर्ता: एक और प्रश्न था कि माया अपना आखिरी दाँव खेलती है; अहंकार- वो कैसे पता चले?
आचार्य प्रशांत: दाँव कुछ नहीं होता उसका। आखिरी तो तब न जब किसी बिंदु पर आ करके उसको मिट जाना हो। आप सतर्क, सावधान रहिए जब तक देह है तब तक माया है।…

प्रश्नकर्ता: मैंने बहुत घिनौने पाप किए हैं, क्या मेरा कुछ हो सकता है?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारा ही कुछ हो सकता है। उनका नहीं हो सकता जो अपने आप को बड़ा पुण्यात्मा या धर्मी समझते हैं। देखो, पापी तो हम सारे ही हैं। जीसस कह गए हैं कि "सफरिंग इज़ सिन…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से जो लोगों ने सिखा दिया है, उसकी वजह से मैं भुगत रहा हूँ। अब क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: देखो, व्यवहारिक होकर देखा करो। किसी की भी गलती हो, भुगत कौन रहा है? जल्दी बताओ। तुम बिलकुल सही जा रहे हो अपनी सड़क पर। और सड़क…

बसंत पंचमी, विद्या की देवी, सरस्वती को समर्पित है। प्राचीन ज्ञान के अनुसार जीवन शिक्षा दो प्रकार की होती है – विद्या और अविद्या। आइए दोनों का अन्वेषण करें:
विद्या और अविद्या
अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया ।इति शुश्रुम धीराणां येनस्तद्विचचक्षिरे ॥

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम बहुत कुछ पढ़ते रहते हैं। तो कोई छवि दिमाग में आ जाती है, उसको सच मान बैठते हैं। क्या ये जो जिज्ञासा है, इन प्रश्नों को पूछना व्यर्थ है? या ये सवाल मूलभूत तत्त्व की तरफ ले जाना चाहते हैं? क्या इन सवालों का कोई मोल…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, आपने अभी होश के सम्बन्ध में बातें कहीं कि सही होश वो नहीं है कि आप अपने विचारों और कर्मों के प्रति होशपूर्ण रहें, सही होश वो है कि आप किसी ऊँचे को, स्वयं को सौंप दें। फिर जो होगा, उसे देखकर आप भी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम!
आपसे प्रश्न पूछा गया था कि – “मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा क्या है?” तो आपने कहा था कि – “मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हम स्वयं ही हैं, क्योंकि हम ही ने बंधनों का चुनाव कर रखा है।” मगर आचार्य जी,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक महिला ने आपसे कुछ दिनों पहले प्रश्न किया था कि – “मेरे घर के लोग मुझे परेशान करते हैं, क्या करूँ?” आपने उन महिला को जवाब दिया था कि – “और भी लोग हैं, आपको ही परेशान करने क्यों आते हैं?”
हमारे जीवन में भी कई…

प्रश्न: आचार्य जी, मेरे डर मेरे माहौल को बदलने नहीं दे रहे हैं? इसमें मैं क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: ऐसा ही है लेकिन ये भी तय है कि अगर भीतर का माहौल बदलता है तो आदमी खुद ही बाहर का माहौल बदल देता है। आदमी खुद ही ऐसे…

प्रश्न: आत्मज्ञान कैसे हो?
वक्ता: स्पष्ट सी बात है कि जिसे जानना है, उसके करीब आना होगा। जिसे जानना है, उससे दूरी बना कर के तो कुछ जाना नहीं जा सकता। आत्मज्ञान में जिस आत्म की बात हो रही है, वो तो अहंकार ही है क्योंकि ज्ञान उसी का हो…

प्रश्न: ‘कोहम्’ का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
वक्ता: यह विचार कोई ज़बरदस्ती करने वाली क्रिया नहीं है। साधना की कोई विधि अपनेआप में नहीं हो सकती। विचार आपके पास पहले ही बहुत सारे हैं। अध्यात्म है ही उनके लिए जिन्हें कहीं कुछ शंका हो, या जिन्हें कहीं कुछ दुविधा हो।…

शुद्धम बुद्धम प्रियं निष्प्रपंचं निरामयां।
आत्मानं तं न जानंति तत्राभ्यासपरा जनाः।।

वक्ता: वितर्क आत्मज्ञानं।
सारे तर्क मन में ही उठते हैं पर हर तर्क ज्ञान की ओर नहीं ले जाता। तर्क सारे उठते मन में ही हैं पर हर तर्क ज्ञान की ओर नहीं ले जाता।
श्रोता: सर, इसमें लिखा है वितर्क आत्मज्ञानं। तो वितर्क आत्मज्ञान के तल तक जाता है।

श्रोता: सेल्फ-इन्क्वायरी का क्या अर्थ है? इस ‘*सेल्फ़*‘ के स्वभाव को कैसे जाना जाता है?
वक्ता : सेल्फ-इन्क्वायरी किसी तरह की पूछताछ नहीं है। सेल्फ-इन्क्वायरी में कुछ भी इन्क्वायर करने के लिए नहीं है। सेल्फ-इन्क्वायरी में कोई प्रश्न है ही नहीं। सेल्फ-इन्क्वायरी प्रश्नों का प्रश्न है। वो आम कौतुहल नहीं…

प्रश्न: रमण महर्षि कहते हैं कि, ‘स्वयं को जानो’, जैसे अगर ‘प्रश्न किया है तो पूछो कि प्रश्नकर्ता कौन है?’
वक्ता: ये स्वयं क्या है? कहाँ से जानोगे इसको?
श्रोता:

प्रश्नकर्ता: सर एक सत्र के लिए कई लोगों को आमंत्रित किया हुआ था पर आए कुछ ही लोग, तो ये जो लोग आएँ हैं, क्या ये उनका निर्णय था या उन्हें आना ही था?
आचार्य प्रशांत: वही चुनिन्दा क्यों आए उसका कारण मिल सकता है, बहुत आसानी से मिल जाएगा।…

प्रश्न: सर, मैं ये जानना चाहता हूँ कि मैं कौन हूँ। मतलब शरीर दूसरों ने दिया, नाम दूसरों ने दिया, विचार भी दूसरों ने ही दिए।
वक्ता: बेटा, ये सवाल भी तो तुम्हें दूसरों ने ही दिया है न।
श्रोता १: सर बहुत जिज्ञासा है जानने की।

प्रश्न: सर, हमारे देश में सभी प्रकार के संसाधन होते हुए भी हम विदेशी ताकतों पर निर्भर हैं – जैसे भाषा, प्राक्रतिक संसाधन, संस्कृति आदि।
वक्ता: तुम दूरदर्शन से आए हो? अरे अपने बारे में कुछ पूछ लो। ‘देश, प्राक्रतिक संसाधन, विदेशी ताकतें।’ अपने बारे में सवाल करो बेटा,…

वक्ता: “चित्तं मन्त्रः” – चित्त और कुछ नहीं है दोहराव के अलावा।
‘मन्त्र’ माने वो जो दोहराया जाए। चित्त और कुछ नहीं है दोहराव के अलावा, और जो कुछ भी आप लगातार दोहराते आए हैं, वही चित्त बन जाता है। जो कुछ भी जीवन में लगातार पुनरुक्त होता रहा है,…

वक्ता: सरफ़राज़ का सवाल है कि अभी हमसे कहा जाए कि अपने बारे में कुछ लिखो, अपने बारे में कुछ बताओ, अपना विवरण दो – सेल्फ-डिस्क्रिप्शन(आत्म-विवरण), तो हम सोचने लग जायेंगे। सरफ़राज़ पूछ रहे हैं कि अपने बारे में भी लिखने के लिए सोचना क्यों पड़ता है? दो वजहें…

वक्ता: हमारी शिक्षा हमको क्या बताती है? हमारा विज्ञान हमको क्या बताता है? वो बताता है कि पत्ती को जानना है, तो पत्ती को क्या करो?
श्रोता १: उसका विच्छेदन करो।
वक्ता: पत्ती को पहले तोड़ना पड़ेगा, और उपकरणों का प्रयोग करो, और ये करो और वो करो। वो ये

प्रश्न: सर, बच कर भाग जाने की प्रवृत्ति से कैसे बचूँ?
वक्ता: पहले ये समझते हैं कि ये भागने की प्रवृत्ति है क्या। और ये समझने के लिये अपनेआप से ये पूछना पड़ेगा कि “मैं ये जो कर रहा हूँ, ये मुझे बचाए रखेगा क्या? मैं जो कर रहा हूँ…

प्रश्न: सर, शुरू से दो शब्द बहुत उपयोग हो रहें हैं यहाँ पर: ध्यान और अवलोकन। उनका मतलब समझ नहीं आ रहा है। अवलोकन – खुद को देखना। ख़ुद को देख लेने से क्या हो जाएगा? देखने का मतलब क्या है?
वक्ता: दो बातें हैं। पहला- देखने का मतलब क्या…

वक्ता: देखो, जो मैं कह रहा हूँ अगर वो पूरी तरह समझ में ना आए तो हैरान मत होना, ये बातें पूरी तरह समझने वाली हैं भी नहीं|
ये एक इशारे हैं, अगर इससे एक दिशा का बोध होता हो तो काफी है| ये विज्ञान नहीं है, गणित नहीं है…

प्रश्नकर्ता: अध्यात्म क्या है?
आचार्य प्रशांत: जानना आपका स्वभाव है। और अगर आप साधारण जानने से ही शुरू करें तो आप जो कुछ जानना चाहते हैं, उसके केंद्र में आप स्वयं हैं। अध्यात्म का अर्थ है–अपने-आप को जानना। जानने की बड़ी उत्सुकता होती है न? बिना जाने रह ही नहीं…

प्रश्न: क्या मेरे हर सवाल का जवाब, ‘मैं हूं’ है?
वक्ता: जिस भाषा में तुमने ये सवाल पूछा है कि क्या मेरे हर सवाल का जवाब, ‘मैं हूं’ है, मैं उत्तर की शुरुआत भी उसी भाषा से करता हूं| तुम सिर्फ सवालों के जवाब ही नहीं हो, सवाल भी तो…

प्रश्न: मेरे मन में ये प्रश्न बहुत बार आता है कि ‘मैं कौन हूँ?’। इसका उत्तर क्या है?
वक्ता: इसको ऐसे समझो कि मेरी उंगली का जो ये सिरा है, जिससे मैं सब कुछ छूता हूँ, ये स्वयं को नहीं छू सकता। कोशिश कर के देख लो। उंगली का कोई…

मैनूं कौन पछाणे,
मैं कुझ गो गई होर नी | टेक |
हादी मैनूं सबक़ पढ़ाया,
ओत्थे होर न आया-जाया,

आचार्य प्रशांत: हमने कहा था कि माइंड इज़ ब्रेन प्लस इंटैलिजैन्स (मन मस्तिष्क और बोध का मेल है)। जब तक ये ब्रेन (मस्तिष्क) परिपक्व नहीं होगा, एक मैच्योरिटी (परिपक्वता) को नहीं पहुँचेगा, इंटैलिजैन्स की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। यही कारण है कि एक छोटा बच्चा विवेकशील नहीं हो सकता, इंटैलिजैन्ट…

प्रश्न: मैं क्यों हूँ सर? क्या हूँ?
वक्ता:*(मुस्कुराते हुए)* कौन है?
श्रोता १:‘आई’ |
वक्ता:‘आई’, माने कौन?

वक्ता: सवाल ये है कि अगर कोई हमारे साथ दुर्व्यवहार कर रहा है और मैं उसको एक समुचित जवाब ना दूँ, तो काफ़ी संभव है कि वो मेरे साथ और भी ज्य़ादा दुर्व्यवहार करेगा, उसका हौंसला बढ़ जायेगा, और मेरे लिए वो और मुसीबत खड़ी करेगा।
चेतना का ये अर्थ…

वक्ता:अजीत का सवाल है कि ये सारी बातें बहुत अच्छी हैं। अभी सुन रहे हैं तो समझ में भी आती हैं लेकिन बाहर निकलते ही परिस्थितियाँ कुछ ऐसे बदलती हैं कि हम इन पर चल नहीं पाते। बाहर लोग हैं, ताकतें हैं जो जानते-समझते भी हमको वो करने नहीं…

श्रोता: सर इस ‘मैं’ को जानने का कोई रास्ता नहीं बताया आपने?
वक्ता: तुम्हें दरवाजे तक जाना हो तो उसका रास्ता बताऊँ, दरवाजा दूर है| उस कुर्सी तक जाने का क्या रास्ता बताऊँ जिस पर बैठे ही हुए हो| जो हो ही, उसका रास्ता क्या बताऊँ? उसको जाना तो जा…

प्रश्नकर्ता: किसी अप्रिय स्थिति का सामना करें या उससे बच कर ही रहें? दोनों ही विकल्प बड़ी ऊर्जा माँगते हैं।
आचार्य प्रशांत: दोनों स्थितियाँ भरपूर ताकत माँगती हैं। देखो, अंत तो सामना करने से ही होगा। प्रश्न ये नहीं है कि, "मैं क्या करूँ?" प्रश्न ये है, ‘’मैं किस लायक…

प्रश्न:जीवन क्या है?
वक्ता: जीवन का क्या अर्थ है? क्या जीवन का अर्थ यही है- उठना, बैठना, खाना, पीना, चलना, सोना और मर जाना? क्या यही जीवन है, या जीवन कुछ और भी है, इसके अलावा, इसके परे, इससे आगे? समझेंगे इसको|
यह तुम जो कुछ भी कर रहे



आचार्य: बहुत सुंन्दर, मतलब क्या है इसका?
प्रश्नकर्ता: सर, वैसे तो हमारे…
(आत्मा के सम्बन्ध में जो लोग प्रयास में लग रहे हैं, वे अपने शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपंच और निरामय
ब्रह्म स्वरुप को नहीं जानते)
आचार्य प्रशांत: तुम ये सब हो, पर तुम्हें…
वक्ता: अरे जब कहते हो ‘स्वयं’, तो कुछ वस्तु तो होती है न मन में…
मुतलिक ज़ात जमाल विखाया,
वहदत पाया ज़ोर नी |
अव्वल होके लामकानी,
ज़ाहर बातन दिसदा जानी,
रही न मेरी नाम निशानी,
मिट गया झगड़ा-शोर नी |
प्यारे आप जमाल विखाली,…
वक्ता:राहुल? राहुल क्यों है, ये तो बड़ी आसान सी बात है | राहुल शब्द तुम्हारे माँ – बाप को…
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.