प्रश्न: सर, मैं ये जानना चाहता हूँ कि मैं कौन हूँ। मतलब शरीर दूसरों ने दिया, नाम दूसरों ने दिया, विचार भी दूसरों ने ही दिए।
वक्ता: बेटा, ये सवाल भी तो तुम्हें दूसरों ने ही दिया है न।
श्रोता १: सर बहुत जिज्ञासा है जानने की।
वक्ता: ये जिज्ञासा तुम्हें होती क्या अगर तुम्हें ये संकल्पना ना दी गई होती कि तुम्हारा शरीर दूसरों का है, तुम्हारे विचार दूसरों के हैं? ये जो जिज्ञासा है, ये भी दूसरों ने ही दी है। जैसे तुम इतनी किताबें पढ़ते हो वैसे ही तुमने एक आध्यात्मिक किताब भी पढ़ ली जिसमें ये सब बातें लिखीं हुई थीं कि शरीर और मन बाहर से आये हैं, तो उस कारण ये सवाल तुम्हारे लिए थोड़ा महत्वपूर्ण हो गया। ईमानदारी से बताओ कि अगर उस तरह की किताबें नहीं पढ़ी होतीं तो क्या ज़िन्दगी भर भी तुम्हें ये सवाल आता कि ‘मैं कौन हूँ?’। और दुनिया में करोड़ों लोग हैं जो ऐसी किसी चर्चा में जाके नहीं बैठते हैं। वो अस्सी-साल के हो जाएँ या पांच-सौ-साल के हो जाएँ, उन्हें कभी ये सवाल उठता है कि मैं कौन हूँ?
श्रोता १: सर तो फिर जीवन व्यर्थ हो जाएगा।
वक्ता: जीवन व्यर्थ हो गया, ये बात भी तुम्हें किसने बताई है? क्या ये तुम्हारा कोई अपना बोध है? ये तो कबीर आए उन्होंने बोल दिया कि जीवन की सार्थकता इसी में है कि आत्मज्ञान हो। ये सब भी तो तुम्हें किसी और ने ही बता दिया है न।

