तुम क्यों हो ये बात विचारणीय नहीं है;‘तुम हो’, ये बात ज़रूरी है| अपने होने को पहचानो और होने का अर्थ है, पूरी तरह होना, अपने स्वभाव को जानना| जब मैं कह रहा हूँ कि तुम हो तो इस बात को भी समझो| होने का अर्थ है सिर्फ वही है, सिर्फ वही अस्तित्वमान है जो स्वभाव में जी रहा है| और क्या है स्वभाव? स्वभाव है सच| स्वभाव है प्रेम|स्वभाव है मुक्ति| स्वभाव है आनंद| जो इनमें है सिर्फ वही है, वरना नहीं है| ‘मैं क्यों हूँ’ नहीं, ‘मैं हूँ’| मैं क्या हूँ? मैं प्रेम हूँ, मैं आनंद हूँ,मैं मुक्ति हूँ, मैं मुक्तिपूर्ण हूँ, मैं प्रेमपूर्ण हूँ, मैं आनंदपूर्ण हूँ और मैं जानता हूँ इसलिए सत्य हूँ| जो इनमें जीता है वो है बाकी नहीं हैं| बाकियों को बस लगता है कि वो हैं| बाकियों को बस एहसास होता है कि वो हैं| वो हैं नहीं| वो बस एक छाया है, एक कल्पना है, एक भ्रम है| वो जी ही नहीं रहे हैं, मशीन की तरह हैं| कोई कल्पना हो सकती है कि हम हैं, पर असल में हैं नहीं| जिसने प्रेम को नहीं जाना वो जी ही नहीं रहा| जो मुक्त नहीं है, वो जी नहीं रहा| जो सत्य में नहीं जी रहा, वो जी नहीं रहा| और जो मौज में नहीं जी रहा, आनंद में नहीं जी रहा, वो जी नहीं रहा| बस यही है तुम्हारा होना| होने पर ध्यान दो।