जिज्ञासा और मुमुक्षा में क्या अंतर है? || आचार्य प्रशांत (2014)

वक्ता: हमारी शिक्षा हमको क्या बताती है? हमारा विज्ञान हमको क्या बताता है? वो बताता है कि पत्ती को जानना है, तो पत्ती को क्या करो?
श्रोता १: उसका विच्छेदन करो।
वक्ता: पत्ती को पहले तोड़ना पड़ेगा, और उपकरणों का प्रयोग करो, और ये करो और वो करो। वो ये थोड़ी कहता है कि पत्ती के साथ दोस्ती करो, पत्ती के प्रेम में हो जाओ, ‘पत्ती’ ही हो जाओ। ये थोड़ी कहा जाता है।
श्रोता २: जिज्ञासु मन बहुत अच्छा माना जाता है।
वक्ता: जिज्ञासा, क्यूरिऑसिटी अपनेआप में ठीक है, पर जिज्ञासा को यदि उचित उपकरण मान लिया गया, यदि ये मान लिया गया कि जिज्ञासा से ही उत्तर मिल जाएगा, तो बात गड़बड़ हो जाती है।
श्रोता ३: जिज्ञासा से तो प्रश्न उठते हैं।
वक्ता: प्रश्न उठ सकता है।
श्रोता ४: पर जिज्ञासा ग्रहणशीलता भी तो है क्योंकि जो जिज्ञासु नहीं है, उसके सामने तुम कुछ बोल रहे हो, तो…?
