प्रश्न: मेरे मन में ये प्रश्न बहुत बार आता है कि ‘मैं कौन हूँ?’। इसका उत्तर क्या है?
वक्ता: इसको ऐसे समझो कि मेरी उंगली का जो ये सिरा है, जिससे मैं सब कुछ छूता हूँ, ये स्वयं को नहीं छू सकता। कोशिश कर के देख लो। उंगली का कोई भी बिंदु, स्वयं को नहीं छू सकता। तुम्हारी त्वचा का कोई भी स्थान, स्वयं को नहीं स्पर्श कर सकता। किसी और को स्पर्श कर सकता है, लेकिन वो हिस्सा स्वयं को नहीं स्पर्श कर सकता। आँख, पूरी दुनिया को देख सकती है पर स्वयं को नहीं देख सकती। कुछ भी कर ले, स्वयं को नहीं देख सकती। तुम आईने में भी देखोगे तो बाहर का आकार ही दिखाई देगा। वो जो देखने वाली इंद्रिय है, वो नहीं दिखाई देगी। यही इंद्रिय सब को तो देख रही है, पर स्वयं को नहीं देख सकती।
इन बातों का अर्थ समझो। जो कुछ भी तुम देख, सुन या छू सकते हो, वो तुम नहीं हो! देखने वाला, ‘दृष्टा’ और जो देखा जा रहा है, ‘दृश्य’, इन दोनों का अलग-अलग होना पक्का है। ‘दृष्टा’ और ‘दृश्य’ दोनों एक तो नहीं हो सकते ना? जो कुछ भी तुम समझ सकते हो, वो तुम नहीं हो। तुम क्या-क्या समझ सकते हो? क्या-क्या है, जिसके प्रति तुम सिर्फ़ एक दर्शक का भाव रख कर समझ सकते हो कि ऐसा चल रहा है? तुम इस पूरी दुनिया को देख के समझ सकते हो, तो ज़ाहिर सी बात है की तुम वो (इशारा करते हुए) पेड़ नहीं हो। सीधी-सी बात है कि तुम ये दीवार नहीं हो। ये कपड़े भी ऐसे ही हैं। तुम जानते हो कि ये कपड़े हैं अलग हैं और तुम अलग। तो तुम तुम्हारे वस्त्र भी नहीं हो।
थोड़ा और गहराई में जाते हैं। वो बाहर, फिर ये कपड़े, अब ज़रा इस शरीर की बात करते हैं। इस शरीर में भी जो कुछ घटता है, होता है, उसको भी तुम समझो कि शरीर में हो रहा है, और मैं देख रहा हूँ। क्या तुम कहते नहीं हो, ‘मुझे गुस्सा आ रहा है’? मतलब मन में, शरीर में गुस्सा आ रहा है। शायद शरीर कड़ा हो रहा होगा, गाल लाल हो रहें होंगे। निश्चित रूप से गाल स्वयं को तो नहीं देख रहा होगा ना कि मैं लाल हो रहा हूँ। निश्चित रूप से तुम्हारे हाथ फड़क रहा है, तो ये हाथ स्वयं को तो नहीं देख रहा होगा ना कि मैं उत्तेजित हो रहा हूँ? तुम कोई हो, जो इन सब को देख रहा है। तुम इनसे अलग कुछ हो, इनसे पृथक कुछ हो, कोई हो, जो ये सब देख रहा है कि मन में गुस्से का विचार आ रहा है। तो शरीर भी नहीं हो तुम।


