प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, आपने अभी होश के सम्बन्ध में बातें कहीं कि सही होश वो नहीं है कि आप अपने विचारों और कर्मों के प्रति होशपूर्ण रहें, सही होश वो है कि आप किसी ऊँचे को, स्वयं को सौंप दें। फिर जो होगा, उसे देखकर आप भी अचम्भित हो जाएँगे। लेकिन मैं जब कृष्णमूर्ति को पढ़ रहा था, तो उन्होंने चॉइसलेस अवेयरनेस (निर्विकल्प होश) की बात कही है।
वो कहते हैं, “जस्ट बी अवेयर (सिर्फ़ होशपूर्ण रहें), जो आप सोच रहे हैं, या आपके भाव हैं, या आपके कर्म हैं, उसके प्रति।” वो कहते हैं कि अगर सिर्फ़ होशपूर्ण रहें, वो स्वतः परिवर्तन आता है। लेकिन आप होश के विषय में कुछ अलग कहते हैं, मुझे ऐसा लगा। तो कृष्णमूर्ति जो कह रहे हैं…
आचार्य प्रशांत: उससे लाभ होता हो, तो उसका अनुपालन कर लो।
तुम अधिक-से-अधिक ये देख सकते हो कि तुम निर्विकल्प हो ही नहीं सकते। सुनने में बड़ा अच्छा लगता है, “निर्विकल्प होश।” ज़िंदगी में आधे पल के लिए भी निर्विकल्प हुए हो?
प्र: नहीं।
आचार्य: तो नारे लगाने से क्या फ़ायदा? तुम तो अगर अपने आपको देखोगे भी, तो यही देखोगे कि मन संकल्पों-विकल्पों से भरा हुआ है। विकल्प और विकल्प, उनके अलावा कुछ है ही नहीं। जो कुछ भी देखते हो, उसको देखना भी तो तुम्हारा चुनाव ही है भई। तो निर्विकल्पता कैसी?

