आत्मज्ञान जीवंत प्रक्रिया है, बौद्धिक नहीं || आचार्य पशांत (2016)

प्रश्न: रमण महर्षि कहते हैं कि, ‘स्वयं को जानो’, जैसे अगर ‘प्रश्न किया है तो पूछो कि प्रश्नकर्ता कौन है?’
वक्ता: ये स्वयं क्या है? कहाँ से जानोगे इसको?
श्रोता: इसी को तो जानना है।
वक्ता: अरे जब कहते हो ‘स्वयं’, तो कुछ वस्तु तो होती है न मन में जिसको जानना चाहते हो। ये स्वयं क्या है? ये रुमाल है, ये टेबल है, ये माइक है, ये दीवार है, ये स्वयं क्या है? किधर को तो इशारा करते हो न। एक शब्द कहीं से पकड़ के लाये हो न – स्वयं। जहाँ शब्द होता है, वहाँ शब्द के साथ एक वस्तु भी होती है, शब्द किसी वस्तु के साथ ही तो जुड़ा होता है? तो ये वस्तु क्या है जिसको जानना चाहते हो?
श्रोता: ये वस्तु एक इच्छा है मेरी।
वक्ता: ये मेरी किसकी? मेरी माने?
श्रोता: मैं
वक्ता: हाथ किधर को इशारा कर रहे हैं? ये क्या था? ये क्या हो रहा है?
