वक्ता: “चित्तं मन्त्रः” – चित्त और कुछ नहीं है दोहराव के अलावा।
‘मन्त्र’ माने वो जो दोहराया जाए। चित्त और कुछ नहीं है दोहराव के अलावा, और जो कुछ भी आप लगातार दोहराते आए हैं, वही चित्त बन जाता है। जो कुछ भी जीवन में लगातार पुनरुक्त होता रहा है, वही चित्त बन जाता है। चित्त और कुछ नहीं है।
जो ही लगातार होता रहा है, वो ही हम हो जाते हैं। इसी कारण बुद्ध ने कहा था कि तुम कुछ और हो ही नहीं अपने विचारों के अलावा। वो कहते थे कि तुम अपने विचार को बदलो, तुम भी बदल जाओगे। अब ये बात बड़ी अजीब है। लोग सुनकर कहते हैं, “एक ओर तो मैं वो हूँ जो नित्य है, जो बदल ही नहीं सकता, शाश्वत है। और बुद्ध इसकी बिल्कुल विपरीत बात कह जाते हैं, कहते हैं कि तुम अपने विचार हो, विचार बदलो तुम बदल जाओगे।”
बुद्ध यही कह रहे हैं कि – “चित्त मन्त्र है।” तुम वही हो जिसको तुमने बार-बार दोहराया है। बार-बार, बार-बार दोहराया है कि तुम ज्ञानी हो, तो ठीक। जो तुम मन्त्र की तरह दोहराते हो, वैसे ही हो जाते हो। वही जीवन हो जाता है तुम्हारा। उसके आगे जो है – बियॉन्ड, ट्रान्सेंडैंटल (परलोक) उसकी तो तुम्हें वैसे भी कोई खबर नहीं, तो उसकी तो बात ही नहीं करेंगे। बुद्ध इसलिए बियॉन्ड की बात ही नहीं करते। कहते हैं, “क्या ये हिपोक्रिसी (पाखण्ड) – “ट्रान्सेंडैंटल, परलोक। सीधे ‘अभी’ की बात करो, जो सामने है, और कुछ हम जानते ही नहीं।” जिस भी चीज़ को बार-बार मन में दोहराओगे, वैसे ही हो जाओगे।
श्रोता १: सर, पतंजलि भी चित्त वृत्ति की बात करते हैं।


