अवलोकन व ध्यान में अंतर || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

प्रश्न: सर, शुरू से दो शब्द बहुत उपयोग हो रहें हैं यहाँ पर: ध्यान और अवलोकन। उनका मतलब समझ नहीं आ रहा है। अवलोकन – खुद को देखना। ख़ुद को देख लेने से क्या हो जाएगा? देखने का मतलब क्या है?
वक्ता: दो बातें हैं। पहला- देखने का मतलब क्या है? और दूसरा- देखने से हो क्या जाएगा? पहली बात – ध्यान का, अवलोकन का मतलब क्या है? दूसरी बात – ये हो भी गया तो इससे होता क्या है?
मतलब कुछ ख़ास इनका है नहीं। दोनों ही जो शब्द हैं, ये बड़े सीधे-साधे हैं। दिक्कत क्या आ जाती है कि हमने ये शब्द पहले से सुन रखे हैं। हैं तो दोनों ही शब्द शब्दकोष से ही है न? तो हमने ‘ध्यान’ शब्द भी पहले से सुन रखा है, और ‘अवलोकन’ भी सुन रखा है। तो जो पहले से मतलब पता है, वो बीच-बीच में आकर मिलना शुरू कर देता है। उसकी वजह से थोड़ी-बहुत उलझन आना लाज़मी है, कोई बड़ी बात नहीं। ठीक है?
अवलोकन बिल्कुल वही है जो तुम जानते हो। अवलोकन का मतलब होता है – देखना। हम जब आमतौर पर अवलोकन की बात करते हैं तो आँखों से देखने की बात करते हैं। जब जीवन के संदर्भ में अवलोकन की बात होती है तो उसका मतलब होता है- जिन भी इन्द्रियों से जान रहे हो वो सतर्क हैं।
तुम संगीत का भी अवलोकन ही करते हो। अवलोकन में लेकिन एक चीज़ होती है कि कोई ‘विषय’ होता है। तुम हमेशा यही कहोगे, मैं इस चीज़ का अवलोकन कर रहा हूँ। वो जो चीज़ है न, वो उस अवलोकन का क्या है? मैं अभी इस माइक का अवलोकन कर रहा हूँ, इस पैन का अवलोकन कर रहा हूँ, दोस्त का अवलोकन कर रहा हूँ, सड़क का अवलोकन कर रहा हूँ;उसका कोई केंद्र होगा, कोई चीज़ होगी जिसका तुम कह सकोगे कि अवलोकन चल रहा है।
अवलोकन हम करते ही रहते हैं। लेकिन जो अवलोकन तुम्हें आज तक पता था और जिस अवलोकन की बात कोर्स में की गयी है, उनमें बस अंतर इतना है कि हमारा जो अवलोकन है वो आमतौर पर साफ़ नहीं होता है।
