ख़ुद को क्यों नहीं जानता? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

वक्ता: सरफ़राज़ का सवाल है कि अभी हमसे कहा जाए कि अपने बारे में कुछ लिखो, अपने बारे में कुछ बताओ, अपना विवरण दो – सेल्फ-डिस्क्रिप्शन(आत्म-विवरण), तो हम सोचने लग जायेंगे। सरफ़राज़ पूछ रहे हैं कि अपने बारे में भी लिखने के लिए सोचना क्यों पड़ता है? दो वजहें हैं।
श्रोता १: सर, जब हम अपने बारे में लिखते हैं, तो हम यह सोचते हैं कि मतलब दूसरा इंसान जिसको हम लिख रहे हैं, वो इसके बारे में क्या सोचेगा? तो डर लगता है कि कहीं उसे पसंद आएगा या नहीं आएगा।
वक्ता: (मुस्कुराते हुए) देखो, तुम्हें मेरी ज़रुरत ही नहीं है सरफ़राज़, तुम्हें खुद ही पता है। अब यही बात मैं, बड़े बोरिंग तरीके से, गोल-गोल घुमा के २० मिनट तक बताता। देखो कितना स्मार्ट है, उसने झट से बता दी १ मिनट में।
क्या नाम है तुम्हारा?
श्रोता १: शशांक।
वक्ता: शशांक। बैठो। बिलकुल ठीक। वजहें दो हैं। पहली तो उसने बता ही दी। तुम अपने लिए लिखते कहाँ हो? तुम लिखते हो कि कोई पढ़ेगा, और जो पढ़ेगा, उससे डरे हुए हो; उसको प्रभवित करना चाहते हो, उसको तुमने बहुत तवज्जो दे रखी है। तो तुम बहुत सोच-सोच के लिखते हो। ठीक वैसे ही, जैसे बाहर निकने से पहले तुम खूब मेक-अप वगैरा करते हो।

