सवाल जवाब नहीं, समाधान || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

प्रश्न: क्या मेरे हर सवाल का जवाब, ‘मैं हूं’ है?
वक्ता: जिस भाषा में तुमने ये सवाल पूछा है कि क्या मेरे हर सवाल का जवाब, ‘मैं हूं’ है, मैं उत्तर की शुरुआत भी उसी भाषा से करता हूं| तुम सिर्फ सवालों के जवाब ही नहीं हो, सवाल भी तो तुम्हीं हो| जवाब की बात तो तब उठती है ना जब पहले…
श्रोता १: सवाल हो|
वक्ता: जब पहले सवाल हो| सवाल भी तो तुम्हीं ने खड़े किये हैं| सवालों के साथ दो काम किये जा सकते हैं| पहला ये कि उनको जवाब दे दिया जाए| और दूसरा ये कि उनका समाधान हो जाए| जिस ‘मैं’ से सवाल निकलते हैं, उसी ‘मैं’ से जवाब बड़ी आसानी से मिल जाएंगे| इसीलिये जवाबों की कोई कीमत होती नहीं| जहां से सवाल आया, वहीं से जवाब भी आ जाएगा| और कितनी ही बार तुमने सवाल उठाएं हैं और जवाब पा लिये हैं| है न?
आज पहली बार तो नहीं होगा कि सवाल उठ रहा होगा? हज़ार बार हो चुका है ना कि सवाल उठे हैं, और हज़ार बार तुम्हें जवाब भी मिल चुके हैं| और सवाल फिर भी उठते रहते हैं| इसका मतलब समझो| इसका मतलब ये है कि ये जो सवाल पूछने वाला ‘मैं’ है, अगर यही जवाब भी दे रहा है, और बहुदा यहीं से जवाब आते हैं, अगर यही जवाब भी दे रहा है, तो जवाब किसी कीमत का नहीं हो सकता| सवाल-जवाब की प्रक्रिया को समझते हो? हर सवाल में जवाब की अपेक्षा पहले से छिपी होती है| उदाहरण देता हूं, समझना|
तुम एक दुकान में जाते हो| एक सुपर-स्टोर है जहां सब कुछ उपलब्ध है, और तुम वहां जा कर सवाल पूछते हो कि आलू का भाव क्या है| ठीक है? ये एक ‘मैं’ है जिससे ये सवाल निकला है, एक ‘मन’ है जिससे ये सवाल निकला है| निश्चित-सी बात है कि तुमने पहले ही अपेक्षा पाल रखी है कि तुम्हें आलुओं का भाव बता दिया जाएगा| प्रश्न तुमने पूछा कि आलू किस दाम मिल रहे हैं, और इसके उत्तर में अगर तुम्हें मुक्ति का रास्ता बता दिया गया तो क्या तुम्हारा मन स्वीकार करेगा? तुम खड़े हो गये हो और काउंटर पर तुम पूछ रहे हो कि आलू किस भाव मिल रहें हैं, और उसने तुमको बताना शुरू कर दिया कि संसार के महापुरुषों ने आज तक क्या-क्या बोला है मुक्ति के बारे में, और मोक्ष तक कितने मार्ग जाते हैं, तो तुम क्या करोगे? तुम स्वीकार ही नहीं करोगे| तुमको तो एक जवाब चाहिये| क्या? आलुओं का…?
