
प्रश्न: सर, जैसा कि हम सुनते हैं कि प्रौद्योगिकी के बहुत नुकसान भी हैं। तो क्या हमें प्रौद्योगिकी का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए और इसे यहाँ ही रोक देना चाहिए?
वक्ता: तुम बताओ बेटा, क्या करोगे। तुम्हारे सामने और कोई चारा है? और क्या करोगे तुम?
श्रोता १: तो…

प्रश्न: अगर जानना धर्म है तो विज्ञान क्या है?
वक्ता: विज्ञान पूरे तरीके से धार्मिक है क्योंकि धर्म है सत्य को जानना। और विज्ञान भी सत्य को ही जानना चाहता है। लेकिन विज्ञान एक छोटी सी चूक कर देता है। समझते हैं:




जहाँ माँस खाना शुरू किया, तहाँ समझ लो कि आप कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ाने वालों की कतार में शामिल हो गए। उपभोग के माध्यमों में जो चीज़ ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक उष्मीकरण) के लिए सबसे ज़्यादा घातक है वो है माँस का सेवन। माँस का सेवन समझ रहे हैं सबसे ज़्यादा घातक…

स्वामी विवेकानंद अनूठे हैं, बहुत कम तुमने साधु-संत-सन्यासी देखे होंगे जो इतने सुघटित सुडौल शरीर के हों, जितने विवेकानंद थे।
खेल की, कसरत की उनकी दिनचर्या में बंधी हुई जगह थी। और यही नहीं कि बस व्यक्तिगत रुप से खेलते थे, अपने साथियों से कहें – व्यायाम आवश्यक है।
जिस

जीवन परिवर्तन के लिए जिसको मैं कहता हूँ ठंडी उर्जा, शाश्वत उत्साह चाहिए। एक भीतर ऐसी हार्दिक प्रेरणा चाहिए जो दसों साल थमे नहीं, कमे नहीं, मिटे नहीं। गर्म जोश में वो बात होती ही नहीं है। गर्म जोश के खिलाफ़ तो सावधान रहा करिए, वो फ़िल्मी होता है।
“मैं…

प्रश्नकर्ता: कृष्णमूर्ति साहब सभी वृत्तियों, विचारों, भावनाओं वगैरह को बिना निर्णय के देखने को कहते हैं। ये मुझे असंभव लगता है। किसी भी विचार या भावना के उठते ही मैं या तो उसके पक्ष में हो जाता हूँ या विपक्ष में। कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: विचार जिसको उठ रहा है…


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये तो साफ है कि जो वैश्विक समस्याऍं हैं, बड़ी समस्याऍं, जैसे ग्लोबल वॉर्मिंग (भूमंडलीय ऊष्मीकरण) या क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन), उनका कारण ये गलत खोज ही है, कि इंसान गलत जगह पर खोज रहा है। तो एक आइडियल वर्ल्ड (आदर्श विश्व) तो यही होगा कि ये…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्य को पाने के लिए एक तरफ तो गुरु की अपरिहार्यता बताई जाती है, मतलब उसके बिना संभव ही नहीं है। एक तरफ तो ये बात की जाती है दूसरी तरफ महात्मा बुद्ध कहते हैं कि ‘अप्प दीपो भव' अपने दीपक स्वयं बनो!
आचार्य प्रशांत: तो ये…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी।
सरकार और जितने भी चिकित्सा प्रमुख हैं, जानकार हैं, उन्होंने एक बात साफ-साफ कह दी है कि इस बीमारी का निवारण बहुत साफ है—'सोशल डिस्टन्सिंग'। जबतक एंटीडोट नहीं आ जाता और उसको न जाने कितने साल लगेंगे, तब तक आप एक दूसरे से दूर रहें और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, स्वामी विवेकानंद के जीवन से क्या सीख मिलती है? अध्यात्म और जवानी में क्या सम्बन्ध है?
आचार्य प्रशांत: देखो, किताबी ज्ञान देने वाले तो हमेशा से बहुत रहे हैं। स्वामी विवेकानंद अनूठे हैं उस आदर्श से जो उन्होंने जी कर प्रस्तुत किया। बहुत कम तुमने साधु-संत, सन्यासी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पर्यावरण को लेकर के बचपन से ही रुझान रहा है और जैसे-जैसे बड़े हुए हैं, उसको विनाश की ओर बढ़ते हुए ही देखा है। काफ़ी इच्छा थी कि इसके लिए कुछ किया जाए पर फिर अपने काम-धाम में ही लग गए। जब कभी भी गाड़ियों में से…

प्रश्न: आचार्य जी, 'भोजन' और 'अध्यात्म' बहुत बातें होती है इस पर — यह मत खाओ, वह मत खाओ, शरीर शुद्धि इत्यादि। कृपया प्रकाश डालें इस विषय पर।
आचार्य प्रशांत: "जल्दी से खाओ और आगे बढ़ो, बहुत काम करना है" — मेरे देखे तो अध्यात्म और भोजन का यही संबंध…

प्रश्न: आचार्य जी, वर्तमान जीवन के व्यवहारिक कष्टों पर प्रकाश डालने की अनुकम्पा करें।
आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें हैं, और बड़ी सीधी-सीधी हैं।
पहली बात तो ये कि - बच्चे मत पैदा करो। अगर ये उम्मीद कर रहे हो कि दुनिया में आठ-सौ करोड़ लोग हैं आज - जो कि

जनमानस में तो शिव और शंकर एक ही हैं, जिनके सहस्रों नाम हैं। सब नाम सुंदर हैं। पर अध्यात्म की सूक्ष्मताओं में जाकर अगर हम इन नामों का अभिप्राय समझें तो उनका सौंदर्य और बढ़ जाएगा। ‘शिव’ अर्थात आत्मा, सत्य मात्र। आप कहते हैं ‘शिवोहम्’, ठीक जैसे उपनिषद कहते हैं,…

बसंत पंचमी, विद्या की देवी, सरस्वती को समर्पित है। प्राचीन ज्ञान के अनुसार जीवन शिक्षा दो प्रकार की होती है – विद्या और अविद्या। आइए दोनों का अन्वेषण करें:
विद्या और अविद्या
अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया ।इति शुश्रुम धीराणां येनस्तद्विचचक्षिरे ॥

प्रश्न: अगर हम चालाकी नहीं दिखाएँगे, तो क्या हमें कुछ नहीं मिलेगा?
आचार्य प्रशांत: चालाकी दिखाने वाले को क्या मिलता है? क्या मिलते देखा है?
प्रश्नकर्ता:

प्रश्न: आचार्य जी, हम क्यों अपने माता-पिता के निर्णयों के आगे हथियार डाल देते हैं?
आचार्य प्रशांत: तुम बताओ, तुमने डाले हैं।
प्रश्नकर्ता:

श्रोता: आचार्य जी, हम अपने शरीर और मन को किस तरह से नियंत्रित कर सकते हैं? ग़लत चीज़ों की तरफ एकदम से खिंचे चले जाते हैं, और सही चीज़ से भागते हैं।
जैसे, हमने कोई दिनचर्या बनाई पढ़ाई के लिए, उसका पालन ही नहीं कर पाते कभी। ध्यान कहीं…

आचार्य प्रशांत: सवाल है, ‘ये टैलेंट, प्रतिभा नाम की चीज़ क्या होती है? और कैसे पता करूँ कि मुझेमें क्या प्रतिभा है?’
निशांत, जिसको तुम प्रतिभा बोलते हो, यह तो आदमी की बनाई हुई धारणा है न, तुम अगर भारत में हो और तुमको एक लकड़ी से एक गेंद को…

प्रश्न: आचार्य जी, एक लड़की होने के कारण हमारे ऊपर बहुत सारी बंदिशें लगाई जाती हैं, जब भी अगर कुछ गलत होता है तो उसका इल्ज़ाम हम पर ही लगता है, क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: क्या नाम है?

आचार्य प्रशांत: आपकी जो रुचियाँ हैं, वो आपके संस्कार से ही तो आती हैं ना? आपकी रुचियाँ कहाँ से आते हैं? रुचियों का स्रोत क्या है? भारत में गोरी चमड़ी पर बड़ा ज़ोर है ।
प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं…
आचार्य प्रशांत: बेटा, किस …
आचार्य प्रशांत: जो चालाकी नहीं दिखाते, वैसे लोग तो शायद तुम्हारे संपर्क में आए ही नहीं।…
आचार्य प्रशांत: देखो तुम हथियार नहीं डालते हो, तुम व्यापार करते हो।
तुम…
आचार्य प्रशांत: शिवांगी बैठो। शिवांगी ने…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आपकी सभी बातें पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर पाता, मैं क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: तुम फँस इसीलिए जाते हो क्योंकि तुम्हें तकलीफ़ सिर्फ़ तब होती है जब ऊँचे काम खराब होते हैं, कि, "ऊँचा काम हो रहा था और मैं किसी निचले केंद्र में ही…

आचार्य प्रशांत: कुछ भी संयोगवश नहीं है। पाँच उँगलियाँ भी हैं तुम्हारी, तो पाँच ही होनी थी, छह नहीं हो सकती। पूरी जो शरीर की विकास प्रक्रिया रही है, जिसमें अस्तित्व के एक एक अणु का योगदान है, उसने ये तय किया है कि पाँच उँगलियाँ हों, और इतना कद…

प्रश्नकर्ता: कृष्णमूर्ति कहते हैं कि “हम ‘*अननोन*’ (अज्ञात) से तो डरते ही हैं, और तो और, हम ‘*नोन*’ (ज्ञात) से भी डरते हैं।”
ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत: वास्तव में जो अननोन भी है, वो है तो मानसिक ही न। मन, अननोन भी जब कहता है तो अननोन की एक छवि…

प्रश्नकर्ता: गिरते हुए समाज में मेरा सही कर्म क्या है?
आचार्य प्रशांत: समाज या दुनिया क्या है? हम हैं, आप हैं; जैसे हम हैं, आप हैं, वैसा ही संसार है। अगर आप समाज को और संसार को गिरता हुआ पाते हैं, तो उसका कारण यही है कि इंसान गिर रहा…

“If you would indeed behold the spirit of death,
open your heart wide unto the body of life.”
Khalil Gibran
**“*Virgins indulge in sex for curiosity,Harlots for money,Widows for remembering the good old days,Wives out of a sense of duty,While the pure pleasure of sexIs possible in adultery.*”**…

प्रश्न: इसका क्या मतलब है कि, “ट्रू ऑब्ज़रवेशन इज़ विदाउट थॉट(असली अवलोकन बिना विचार के होता है)”? इसको कृष्णमूर्ति बहुत बार कहते हैं कि, “ट्रू ऑब्जरवेशन इज़ ऑलवेज़ विदाउट थॉट।”
वक्ता: सोच-सोच के कुछ भी देख कैसे सकते हैं? थॉट विल एनलाइज़, थॉट विल नॉट ओब्ज़र्व, थॉट विल नॉट…

प्रश्नकर्ता: मैं जीवन में जो भी कर रहा हूँ उस के विरुद्ध जब तर्क आते हैं तो और उन तर्कों को काटने के लिए मेरे पास तर्क नहीं होते, तो ख़ुद पर संदेह होता है। जीवन में संदेह कैसे कम करें?
आचार्य प्रशांत: जितने भी आपको तर्क दिए जाते हैं…

वक्ता: विवेक क्या है? विवेक, विवेक का शाब्दिक अर्थ तो भेद करना ही है; अंतर करना। लेकिन किस-किस में अंतर करना? एक अंतर ये होता है कि एक ही आयाम, एक ही डायमेंशन की दो अलग-अलग इकाईयों में तुम अंतर करो, कि X एक्सिस है और उसमें तुम अंतर कर…

साहब नज़र रखना, मौला नज़र रखना तेरा करम सबको मिले, सबकी फ़िक्र रखना न आदमी की आदमी झेले गुलामियाँ, न आदमी से आदमी मांगे सलामियाँ जो फ़र्क पैदा हो रहे, वो फ़र्क गर्क हों सबको बराबर बाँट, ये धरती ये आसमान कोई भी न हो दर्द में, सबकी ख़बर रखना…

प्रश्न: सर, हरफनमौला और मस्तमौला में अंतर क्या है?
वक्ता: एक ही बात है । देखो, मस्ती भी बटी हुई नहीं रहती है । मस्ती, भी तभी मस्ती है, जब वो लगातार है। अगर तुम्हारी मस्ती निर्भर है परिस्थितियों पर, तो ये बड़ी डरी-डरी मस्ती है। जो कांपती रहेगी कि…

मैं छुपाना जानता तो जग मुझे साधु समझता।
शत्रु मेरा बन गया है छल रहित व्यवहार मेरा।।
प्रश्न: सर, क्या यह पंक्तियाँ सही कह रही हैं?
उत्तर: विवेक,
छल रहित होना कभी कमज़ोरी नहीं होती।
निश्छलता आती है इस गहरी आश्वस्ति के साथ कि मुझे छल, धोखा, चालाकी की ज़रुरत…

*भूले मन..!समझ के लाग लदनियां..!थोड़ा लाद..अधिक मत लादे..टूट जाये तेरी गर्दनिया..!..*
*भूले मन…भूखा हो तो भोजन पा ले..आगे हात न बनिया…!*
*भूले मन….प्यासा हो तो पानी पि ले..आगे घात न पनियां…*
*भूले मन….कहे कबीर सुनो भाई साधो..काल के हाथ कमनियां…*…

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय
धागा क्या है? जिसके दो छोर हैं, दो सिरे हैं. दो दूरियों के मध्य जो है, सो धागा.
एक ही दूरी है जीवन में, बाकी सारी दूरियां इस एक दूरी से निकलती हैं. स्वयं…

प्रश्न: मनुष्य ‘स्वार्थी’ है या ‘मतलबी’?
उत्तर: तुमने ‘स्वार्थ, मतलब’ के बारे में जानना चाहा है।
अर्थ माने कुछ ऐसा जो तुम्हें लुभावना, प्रिय लगता हो।
(यहां पर) ‘स्व’ माने अहंकार।
स्वार्थ माने वो जो अहंकार को प्यारा लगे।और मतलब माने भी अर्थ।
सत्य मात्र ‘होता है’, और उसका ‘मतलब’…

प्रश्न: सर, हर व्यक्ति में कोई मूल गुण होता है। उसे कैसे पहचानें?
वक्ता: शशांक ने कहा कि हर व्यक्ति में कोई मूल गुण होता है, उसे कैसे पहचानें? मूल जो होता है तुम्हारा, ‘केन्द्र’, ‘स्त्रोत’ इसका कोई गुण नहीं होता, वो निर्गुण है। उसका कोई गुण नहीं होता। वो…

वक्ता: सवाल है कि अपनी काबिलियत पता है, ये भी पता है कि क्या कर के दिखा सकती हूँ, उसके बाद भी अगर सफलता नहीं मिलती तो क्या करूँ? तुम्हें काबिलियत पता है या फिर तुमने बस मान लिया है कि काबिलियत है? जिसको तुमने मान लिया है कि काबिलियत…

प्रश्न: सर सफलता कैसे पाएँ?
वक्ता: तुम मुझे बताओ कि सफलता क्या है?
श्रोता: परिश्रम करने से सफलता मिलती है।
वक्ता: तुम कहना चाहते हो कि परिश्रम करने से सफलता मिलती है। यह पंखा देखो। यह कितना परिश्रम कर रहा है, परिश्रम करते-करते गरम हो गया है।
श्रोता: यह पंखा…


Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…

अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक तरफ़़ तो फ़िल्में हमें मनोरंजन देती हैं, हँसाती हैं, रुलाती हैं और दूसरी ओर उसी इंडस्ट्री से दुःखद और चौका देने वाली खबरें भी आती रहती हैं। कुछ कहिए।
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो हमें इस धारणा से बाहर आना होगा कि फ़िल्में हमें मात्र मनोरंजन…

श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,…


हम कहते हैं कि अब कुछ नया करते हैं, फ़ूड योगा , मूड योगा * । कोई ऐसा शब्द नहीं है जो अब * योगा के साथ नहीं जोड़ दिया गया है। नई-नई क्रियाएँ निकल रही हैं, नई-नई प्रक्रियाएँ निकल रही हैं। ये मुद्रा, ये आसान, ये करते हैं, वो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम लोग कुछ भी करने बैठें, जैसे पढ़ने बैठें, योग करें, मैडिटेशन करें, यहाँ तक कि जब मैं आपसे ये सवाल भी पूछ रहा हूँ तो ये सवाल पूछते हुए भी मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा है। तो प्रश्न ये है कि मन को नियन्त्रित…