वक्ता: विवेक क्या है? विवेक, विवेक का शाब्दिक अर्थ तो भेद करना ही है; अंतर करना। लेकिन किस-किस में अंतर करना? एक अंतर ये होता है कि एक ही आयाम, एक ही डायमेंशन की दो अलग-अलग इकाईयों में तुम अंतर करो, कि X एक्सिस है और उसमें तुम अंतर कर रहे हो कि पॉजिटिव X एक्सिस पर क्या है और नेगेटिव X एक्सिस पर क्या है। ठीक है? तो एक अंतर तो ये हो गया कि काला और सफ़ेद का अंतर कर लिया| इसमें आयाम एक ही है| क्या आयाम है काले और सफ़ेद में, जब अंतर कर रहे हो? कि दो ऐसी चीज़ें हैं जो आँखों से दिखाई देती हैं, तो एक ही आयाम है| या तुमने पाप और पुण्य का अंतर कर लिया, उसमें भी आयाम एक ही है| कौन सा आयाम है उसमें? नैतिकता का, कि कुछ बातें हैं जिनको करना पाप माना गया है, कुछ बातें हैं जिनको करना पुण्य माना गया है| ऐसा करो, ऐसा ना करो | ये सारी बातें अंतर तो देती हैं, भेद तो देती हैं पर ये वास्तविक रूप से विवेक का क्षेत्र नहीं हैं |
विवेक का अर्थ होता है ये देखना कि कौन सी चीज़ है जो मन के आयाम की है, और कौन सी चीज़ है जो मनातीत है| इनमें अंतर कर पाए तो विवेक है| आदिशंकर, जो अद्वैत के आचार्य हुए हैं, उन्होंने विवेक की परिभाषा दी है – नित्य और अनित्य में भेद करना विवेक है | नित्य और अनित्य मेंभेद | नित्य माने वो जो है भी, होगा भी, जिसका समय से कोई लेना ही देना नहीं है, जो समय के पार है| ठीक है? और दूसरी चीज़ें, वस्तुएं, व्यक्ति, विचार होते हैं, जो समय में आते हैं और चले जाते हैं, उनको अनित्य कहते हैं| नित्य वो जिसका समय से कोई लेना देना नहीं है, जो कालातीत सत्य है, वो नित्य है| और वो सब कुछ जो समय की धार में है, अभी है, अभी नहीं होगा, यानि कि मानसिक है; वो सब अनित्य है|
तो एक तरीका ये है उसको देखने का, कि दो अलग-अलग आयाम हो गए, एक आयाम हुआ मन का कि क्या ये सब मानसिक है, जो बातें अभी हो रही हैं| मानसिक क्या है? मानसिक वो सब कुछ है जो द्वैतात्मक है, जहाँ पर आँखों से देखा जा रहा है, कानों से सुना जा रहा है और फिर मन से उसका विश्लेषण किया जा रहा है, यही द्वैत है | जो कुछ भी इन्द्रियों से पकड़ते हो, उसी का नाम द्वैत है|
विवेक का अर्थ हुआ ये देखना कि मैं जिन बातों को महत्वपूर्ण माने बैठा हूँ, वो सब इन्द्रियगत हैं, मानसिक हैं, समय की धारा की हैं या फिर वो सत्य हैं| और ये दो अलग-अलग आयाम हैं| यहाँ एक ही आयाम में भेद नहीं किया जा रहा है| यहाँ कहा जा रहा है कि तुम चाहे काले को महत्व दो, चाहे सफ़ेद को महत्व दो, बात एक ही है क्योंकि दोनों एक ही आयाम के हैं| ठीक है? तुम चाहे पकड़ने को महत्व दो, चाहे छोड़ने को महत्व दो, बात एक ही है क्योंकि वो एक ही आयाम के हैं| तो ये विवेक का प्रश्न ही नहीं है| क्योंकि विवेक का अर्थ है वास्तविक रूप से अंतर कर पाना और वास्तविक रूप से अंतर ये होता है कि जो बात मेरे सामने है, वो मानसिक है या सत्य है|


