प्रश्न: सर, हरफनमौला और मस्तमौला में अंतर क्या है?
वक्ता: एक ही बात है । देखो, मस्ती भी बटी हुई नहीं रहती है । मस्ती, भी तभी मस्ती है, जब वो लगातार है। अगर तुम्हारी मस्ती निर्भर है परिस्थितियों पर, तो ये बड़ी डरी-डरी मस्ती है। जो कांपती रहेगी कि अगर परिस्थिति बदली तो मेरा क्या होगा। अगर तुम एक विशेष स्थिति में ही आनन्द मग्न हो सकते हो, मस्त हो सकते हो, तो तुम्हारा आनन्द, आनन्द है ही नहीं। वो तो लगातार याचना करता रहेगा कि ये स्थिति ना बदले। आज की रात नाच पा रहा हूं, सुबह ना आए क्योंकि सुबह आ गई तो पता नहीं। फूल अभी रात में खिला है, सुबह झड़ जाएगा। फिर वो मस्ती, ‘मस्ती’ नहीं है। उसमें डर घुला हुआ है। ‘हरफनमौला’ का भी यही अर्थ है कि जो लगातार डूबा हुआ है। और ‘मस्तमौला’ का भी यही अर्थ है कि जो लगातार मस्त है।
मस्ती, ‘मस्ती’ नहीं अगर वो लगातार नहीं है, और हरफनमौला ‘तुम’ नहीं, अगर तुम जो भी कर रहे हो, उसी में बैठ नहीं गये, तो दोनों एक ही हैं। कोई ‘हरफनमौला’ ऐसा नहीं हो सकता, जो ‘मस्त’ ना हो, और कोई ‘मस्त’ ऐसा नहीं हो सकता, जो ‘हरफनमौला’ ना हो। ऐसे समझ लो। और अगर ऐसा पाते हो कि साहब अपने आप को मस्त बोलते हैं पर इनकी मस्ती, बड़ी सिमित रहती है, प्रसंगवश रहती है, तब कहना, ‘तुम मस्त नहीं हो’। देखे हैं न ऐसे लोग, जो जब शराब पीते हैं, तभी उनकी मस्ती जगती है? ये कोई खाक मस्ती है? ये तो लगातार बस यही मानेंगे कि नशा न उतरे क्योंकि नशा उतरेगा तो मौज भी ख़त्म हो जानी है। मस्त ऐसे रहो कि तुम्हें किसी मौके की ज़रुरत ना पड़े। हममें से ज़्यादातर लोग ज़िंदगी को इसी इंतजार में जीते हैं कि कोई खास मौका आएगा, तब हम मगन हो लेंगे। ऐसे ही जीते हो ना?
जीवन हमारे लिए प्रतीक्षा जैसा है। हम सब लगातार इंतजार कर रहे हैं। किस-किस चीज़ का इंतजार कर रहे हो? तुम इंतज़ार कर रहे हो कि एक विशेष परिणाम आ जाए, कोई मिल जाए, कुछ पैसा इकट्ठा हो जाए। एक खास दिन आएगा, इसकी प्रतीक्षा में बैठे हो। है ना? तुमने अपनी मस्ती को भी स्थगित कर रखा है। लगातार उसे आगे बढ़ा रहे हो, आगे के लिए। ये कोई बात नहीं हुई। मस्ती वो, जो निरंतर है। उठते-बैठते, चलते, खाते, और वो मस्ती मनोरंजन नहीं है। जब मैं मस्ती कह रहा हूँ, तो उसका वही अर्थ मत ले लेना, जो आम-तौर पर लिया जाता है। मस्ती से मेरा अर्थ है, एक प्रकार की ‘निर्भयता’। एक प्रकार की ‘निश्चिन्तता’। ‘निश्चिन्तता’ समझते हो? मन में कोई चिंता नहीं है। ‘निर्भयता’ समझते हो ना? कोई डर नहीं बैठा हुआ। और यही दोनो हैं जो मस्ती को काटते हैं। डर, बिना बात का चिंतन, जो ये नहीं कर रहा है, वही मस्त है।


