अपनी क्षमता का कैसे पता करें? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

श्रोता: आचार्य जी, हम अपने शरीर और मन को किस तरह से नियंत्रित कर सकते हैं? ग़लत चीज़ों की तरफ एकदम से खिंचे चले जाते हैं, और सही चीज़ से भागते हैं।
जैसे, हमने कोई दिनचर्या बनाई पढ़ाई के लिए, उसका पालन ही नहीं कर पाते कभी। ध्यान कहीं न कहीं भटक जाता है। तो ऐसा कैसे कर पायें कि जो सोचा था उसका पालन कर पायें?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारी कोशिश ये है कि मैं जैसी ज़िन्दगी जी रहा हूँ, जीता रहूँ। पर उसके बाद भी, जो मैं नियंत्रित करना चाहता हूँ, वो मैं कर लूँ।
चील अगर आपने आप को बोले, कि मुझे आज से घास खानी है। और वो बहुत ज़ोर से बोले, कि आज से जो मेरी माँस खाने की प्रवत्ति है, मैं उसको त्यागती हूँ। माँस पर नियंत्रण और घास चालू। तो क्या उसे कभी भी सफ़लता मिलेगी?
श्रोता: नहीं।
आचार्य जी: वो जब तक ‘चील’ है, तब तक उसे माँस ही आकर्षित करेगा। इसी बात को अपने सन्दर्भ में समझो। तुम जब तक ‘तुम’ हो, तुम्हें वही सब कुछ आकर्षित करेगा, जो करता है। और तुम जब तक ‘तुम’ हो, तुम्हें वो सब नहीं आकर्षित करेगा, जो आज भी नहीं करता है। तुम चाहते हो कि मैं तो वैसा ही बना रहूँ जैसा मैं हूँ, मेरी पूरी पहचाने, मेरा पूरा अहंकार, मेरे मन, की जो पूरी व्यवस्था है, वैसी ही बनी रहे जैसी है। क्योंकि उसमें तुम्हें सुविधा है। पर साथ ही साथ, मुझे एकाग्रता भी उपलब्ध हो जाए, मुझे नियंत्रण भी उपलब्ध हो जाए; ये हो नहीं पायेगा ना! तुम असम्भव की माँग कर रहे हो।
