भोग-प्रौद्योगिकी, महाविनाश || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

प्रश्न: सर, जैसा कि हम सुनते हैं कि प्रौद्योगिकी के बहुत नुकसान भी हैं। तो क्या हमें प्रौद्योगिकी का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए और इसे यहाँ ही रोक देना चाहिए?
वक्ता: तुम बताओ बेटा, क्या करोगे। तुम्हारे सामने और कोई चारा है? और क्या करोगे तुम?
श्रोता १: तो सर क्या हमारे सामने कोई और विकल्प नहीं है क्या?
वक्ता: तुम्हारे सामने दो विकल्प हैं- अगले चालीस साल में विलुप्त हो जाओ या अपने रास्ते बदल दो। बोलो क्या करना है?
श्रोता २: सर, आज-कल प्रौद्योगिकी तो हर चीज़ में इस्तेमाल हो रही है और ये विकास के लिए भी बहुत आवश्यक है।
वक्ता: ये जो प्रौद्योगिकी इस्तेमाल हो रही है (माइक की ओर इंगित करते हुए), वो ये कहने के लिए हो रही है कि प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कम से कम करो। अगर यहाँ ऐसे लोग बैठे होते जिन्हें यह सुनने की आवश्यकता ही नहीं थी तो करना क्या है इस माइक का। यहाँ वो लोग बैठे हैं जिन्हें यह सुनने की आवश्यकता है कि प्रौद्योगिकी तुम्हारा कितना नुकसान कर रही है। अपनी जवानी में ही ख़त्म हो जाओगे। इस कारण बोलना पड़ रहा है।
एक आदमी को गोली लगती है, तो गोली ने क्या किया? – शरीर छेद दिया, और वो शरीर में जा कर के बैठ गई। उसके बाद डॉक्टर आता है, वो भी सर्जरी के अपने उपकरण ले कर के आता है। अब डॉक्टर भी शरीर को क्या कर रहा है? जैसे गोली ने शरीर को काट दिया वैसे डॉक्टर भी तो शरीर को काट ही रहा है न। क्या तुम डॉक्टर को यह तर्क दोगे – कि यदि शरीर को काटना बुरा था तो आप भी तो वही कर रहे हो। डॉक्टर क्या बिल्कुल वही काम नहीं कर रहा जो गोली ने करा था? गोली ने क्या करा था? शरीर को छेद दिया था। मांस को चीर करके अन्दर चली गयी थी। डॉक्टर भी यही करेगा, वो भी मांस को चीर करके अन्दर जाएगा। पर डॉक्टर को तुम्हारे मांस को चीर कर भीतर क्यों जाना पड़ रहा है? क्योंकि वहाँ एक गोली बैठी हुई है। नहीं तो डॉक्टर को कोई आवश्यकता नहीं थी।

