प्रश्न: आचार्य जी, वर्तमान जीवन के व्यवहारिक कष्टों पर प्रकाश डालने की अनुकम्पा करें।
आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें हैं, और बड़ी सीधी-सीधी हैं।
पहली बात तो ये कि - बच्चे मत पैदा करो। अगर ये उम्मीद कर रहे हो कि दुनिया में आठ-सौ करोड़ लोग हैं आज - जो कि जल्दी ही हज़ार-करोड़ भी हो जाएँगे, ग्यारह-सौ करोड़ भी हो जाएँगे — इतने रहे आएँ, और इतनों को तुम सुखपूर्वक भी रख पाओ, तो वो हो नहीं सकता। प्रश्न के मूल में एक कल्पना है, एक आदर्श है। कल्पना ये है कि जितने भी जीव-जंतु, प्राणी मात्र हैं — खास तौर पर मानव हैं — वो सब धन-धान्य से परिपूर्ण सुख की स्थिति में रहें। ये कल्पना कभी साकार नहीं हो सकती। पृथ्वी के पास इतना नहीं है कि वो इतने लोगों को खिला सके।
आज अगर कहीं पर भी भुखमरी है, तो वो इसलिए नहीं है कि बहुत कम उत्पादन हो रहा है, वो इसलिए है क्योंकि आदमी लालची है भोग का। वो एक तरफ़ तो भोगता है उन सब चीज़ों के माध्यम से जो उत्पादित हो रही हैं, और दूसरी तरफ़़ वो भोग-भोगकर के संतानें उत्पन्न करता है। नतीजा — हम एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ बहुत सारे लोग हों, क्योंकि भोगने में संतानोत्पत्ति निश्चित रूप से शामिल है। आपको आपके बड़े -बूढ़े आशीर्वाद भी देते हैं, तो दो बातें अक्सर कहते हैं — “दूधो नहाओ, और पूतो फलो," और दोनों बातें भोग से संबंधित हैं, गौर से समझना।
पहली बात कहती है कि - तुम्हारे पास खाने-पीने को बहुत सारा हो, और दूसरी बात कहती है कि - तुम बहुत सारे बच्चे पैदा करो। तो तुम ले देकर के ये आशीर्वाद पा रहे हो कि तुम अपनी तादाद भी बढ़ाते जाओ, और जिनकी तादाद बढ़ रही है, वो सब और-और, और-और भोगते भी जाएँ। इस पृथ्वी के पास इतना है कहाँ?

