माँस खाना अपराध है समूची पृथ्वी के विरुद्ध || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्न: आचार्य जी, 'भोजन' और 'अध्यात्म' बहुत बातें होती है इस पर — यह मत खाओ, वह मत खाओ, शरीर शुद्धि इत्यादि। कृपया प्रकाश डालें इस विषय पर।
आचार्य प्रशांत: "जल्दी से खाओ और आगे बढ़ो, बहुत काम करना है" — मेरे देखे तो अध्यात्म और भोजन का यही संबंध है। "जो खाना है जल्दी से खाओ बेटा, काम बहुत करना है, घंटे-भर बैठकर खाते ही ना रहो!" तो मुझसे पूछेंगे अगर, "अध्यात्म में भोजन का क्या महत्व है?" तो मैं यही कहूँगा कि भोजन का यही महत्व है कि जल्दी-से-जल्दी निपट जाए, ताकि जो करना है उसके लिए समय रहे।
ऐसे भी आध्यात्मिक लोग होते हैं जो दिन भर भोजन का ही प्रबंध करते रहते हैं, जो कहते हैं, "भोजन ऐसे तैयार होना चाहिए, वैसे तैयार होना चाहिए, यह स्वच्छता होनी चाहिए, ऐसे पाक-साफ़ होना चाहिए।" उनसे पूछो, "तुम दिन भर कर क्या रहे हो? देह की तैयारी। यही तुम्हारा अध्यात्म है?"
प्रश्नकर्ता: तो इससे तमोगुण पर कोई असर नहीं पड़ता?
आचार्य प्रशांत: रूखी सूखी खाय कै ठंडा पानी पीव, देख पराई चूपरी मत ललचावे जीव।
दबा के खाओगे तो पचाने में समय बहुत लगेगा, बहुत खाओगे तो नींद बहुत आएगी; काम बहुत बाकी है। जब जगना हो रात-भर, तो खाना कम ही खाना चाहिए। अध्यात्म का मतलब ही यही है कि जो तमसा की काली अंधेरी रात है, उसमें हमें जागृत रहना है। जिन्हें जागृत रहना है, वह ज़रा कम खाएँ। कम खाओ, और बहुत भेद मत करो कि यह खाया कि वह खाया — गेंहूँ मिले तो गेंहूँ खा लो, बाजरा मिले तो बाजरा खा लो। अब मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि मुर्गा मिले तो मुर्गा खा लो। तुम्हारा कुछ भरोसा नहीं है।
