
संघर्ष में हम सभी हैं; ज़िंदगी युद्ध तो है ही। दूसरे को क्या दिखाना चाहते हो? अपनी चोट, अपनी हार या अपना हौसला? अपना हौसला दिखाओ न दूसरे को!
बचना ऐसे लोगों से जो बार-बार तुम्हें अपनी चोट और अपने घाव दिखाते हों। उसके पास जाना जिसके पास चोट भी…

तुम्हारा बस काम क्या है? तुम बस कह दो कि, “तू मुझे अधिक-से-अधिक यह दिखा सकता है न हो कि मैं कितना गिरा हुआ हूँ, कितना गिरा हुआ हूँ, कितना गिरा हुआ हूँ मैं मान लूँगा। पर मैं काम करता रहूँगा, मैं जितना भी गिरा हुआ हूँ वहाँ से मैं…

प्रश्नकर्ता: मुझे ग्यारहवीं और बारहवीं में शिक्षकों द्वारा यह दबाव बनाया जाता था कि तुम केवल पाठ्यक्रम का ही पढ़ो पर मैं उन पर ध्यान ना देकर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी करता था। मुझे अच्छा कॉलेज भी मिल गया इस कारण। लेकिन अभी कॉलेज में मैं एक्स्ट्रा को-करिकुलर एक्टिविटी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल मैं एक मीटिंग में था और जो सज्जन मेरे सामने थे उन्होंने बात-बात में ऐसे ही, ज़रूरत नहीं थी, उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के जो दो मूल शब्द हैं — सकाम कर्म और निष्काम कर्म, उनका प्रयोग ऐसे ही कर दिया हवा में। मैं ये सोच रहा था…

प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते, परिवार से, दोस्तों से और मोटिवेशनल स्पीकर्स से बहुत सारी मोटिवेशनल पंक्तियाँ सुनी हैं जैसे कि थिंक बिग, बड़ा सोचो, हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती, नेवर गिव अप (कभी हार न मानो), विनर्स नेवर क्विट एंड क्विटर्स नेवर विन (जीतने वाले कभी खेल…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। यूट्यूब है, और यूट्यूब पर कितनी ही कोशिश करें, कितने ही वक्ता, प्रवक्ता, कथावाचक, मोटिवेशनल स्पीकर्स सामने पड़ ही जाते हैं। कई सारे लोग हैं जो 'जीवन में काबिल कैसे बनें', 'सफल कैसे बनें' इन सब विषयों पर बहुत बाते करते हैं। उनको सुनकर लगता है…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने आपके पॉज़िटिव थिंकिंग को लेकर काफी वीडिओज़ देखे हैं और हमेशा आप पॉज़िटिव थिंकिंग को लेकर आलोचनात्मक ही रहे हैं। ये बात मुझे समझ में भी आती है कि पॉज़िटिव थिंकिंग की जगह समझ ज़्यादा ज़रूरी है लेकिन मैंने अपने स्वयं के जीवन में देखा है…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी जब मैं आध्यात्मिकता के बारे में किसी और से बात कर रहा होता हूँ तो एक शानदार ऊर्जा शब्दों के माध्यम से बह रही होती है। मैं दो घण्टे लगातार बिना सोचे-समझे बोल रहा होता हूँ। लेकिन जब मैं खुद को प्रतिबिम्बित करता हूँ उन्हीं शब्दों पर,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, पिछले सत्र में आपने कहा था कि साहस की कमी है, तो मैंने ये रियलाइज़ करा कि मैं चीज़ों को छोड़ कर भाग जाता हूँ, उसका सामना नहीं करता हूँ। तो उसपर काम कर रहा हूँ। आपने दूसरी चीज़ भी बताई थी, संकल्प को लेकर के।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मोटिवेशन इतना क्यों चलता है? हर हफ्ते कोई नया वीडियो आ जाता है, जैसे, “आग लगा देंगे! आसमान गिरा देंगे!" बुकस्टोर्स में भी ऐसी ही किताबें बिक रही होती हैं। ये मोटिवेशन का चक्कर क्या है?
आचार्य प्रशांत: मोटिवेशन क्या है ये समझ लेंगे, पहले ये याद…

प्रश्नकर्ता: सर, जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती है जब अपने लक्ष्य के लिए पूरी मेहनत करने के बावजूद सफलता नहीं मिलती, हिम्मत पूरी तरह से टूट जाती है। ऐसे में कुछ भी करने का मन नहीं करता, कोई मोटिवेशन काम नहीं आता। ऐसी परिस्थिति से बाहर कैसे निकलें?
आचार्य प्रशांत:…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी सत्-सत् नमन, आज से एक साल पहले मुझे एक शिविर के द्वारा आपका सानिध्य प्राप्त करने का मौका मिला था। व्यवसाय से मैं एक डेंटिस्ट हूँ, शिविर के पश्चात कुछ महिनों तक मन काफ़ी शांत रहा और यहाँ तक कि अपने व्यवसाय में भी कुछ बदलाव देखने…

प्रश्न: आचार्य जी, मुझे अपने बारे में बताना कि मैं कैसा हूँ। मुझे बहुत भय लगता है, खासकर के महापुरुषों, जैसे आपके सामने।
आचार्य प्रशांत: (हँसते हैं) महापुरुष किसको बोला? दोबारा मत बोलिएगा! (हँसते हुए) गाली दे रहे हैं?

प्रश्न: आचार्य जी, अचानक गुस्सा क्यों आता है?
आचार्य प्रशांत: बल्ब चालू करते हो, कितना टाइम लगता है बल्ब को जलने में? सब कुछ अचानक हो जाता है ना? हम भी वैसे ही हैं।
प्रश्नकर्ता: लेकिन बाद में दुःख होता है ना, कि हमने गलत किया !

आचार्य प्रशांत: आपकी जो रुचियाँ हैं, वो आपके संस्कार से ही तो आती हैं ना? आपकी रुचियाँ कहाँ से आते हैं? रुचियों का स्रोत क्या है? भारत में गोरी चमड़ी पर बड़ा ज़ोर है ।
भारत में गोरी चमड़ी पर बड़ा ज़ोर है । ग़ुलामी बिलकुल छायी हुई है…

प्रश्न: सर, कई सारे लोग हैं जो पढ़ने के शौक़ीन हैं, पर जो भी हम बाहर से इकट्ठा कर रहे हैं, वो संस्कार ही हैं। तो क्या हमें पढ़ना चाहिए या नहीं चाहिए?
वक्ता: देखिये, ये मत भूलिएगा कि जिस तरह दो तरीके के लोग होते हैं, उसी प्रकार दो…

वक्ता: बात न स्मार्ट वर्क की है, न हार्ड वर्क की है। ध्यान से समझना। बात
कार्यकर्ता की है। हम सतह पर अटक कर रह जाते है जब हम पूछते हैं कि स्मार्ट वर्क और हार्ड वर्क में अंतर क्या है? तुम्हारा क्या नाम है?

सौ बरसा भक्ति करे, एक दिन पूजे आन ।
सौ अपराधी आत्मा, पड़े चौरासी खान ।।
~संत कबीर

वक्ता: अभय (श्रोता को इंगित करते हुए) का सवाल है कि मैं बी. टेक तो कर रहा हूँ, लेकिन मेरी रुचि कविताएँ लिखने में है। ये कह रहे हैं कि इनका पैशन कविता लिखने में बहुत ज़्यादा है । ये अजीब स्तिथि हो गई है, दुविधा है। पूछ रहा है…

प्रश्नकर्ता: स्वीकृति, मान्यता हमारे लिए इतना महत्व क्यों रखती है? जब कोई नहीं होता तो हम ख़ुद अपने-आप को अपनी स्वीकृति देने लगते हैं।
आचार्य प्रशांत: स्वीकृति से, मान्यता से नियंत्रण का भाव आता है। "जो हो रहा है वो मेरे चाहे हो रहा है। मैं पूरे नियंत्रण में हूँ।…

प्रश्न: सर, ‘फ्रैंक'(निसंकोच) शब्द का क्या अर्थ है? हम कब निसंकोच होते हैं?
वक्ता: ‘फ्रैंक’ का अर्थ है सीधा, सपाट, सरल, अबाधित| संकोच शब्द समझती हो? संकुचन से जुड़ा हुआ है| संकुचन का मतलब है अपने आप को छोटा अनुभव करना, संकुचित अनुभव करना| जब तुम अपने आप को छोटा,…

प्रश्न: किसी चीज़ के पीछे जाते हैं, सफलता चाहिए। शुरुआत करते हैं, कुछ समय तक तो जुनून बना रहता है फिर जोश घटने लग जाता है, मामला ठंडा पड़ जाता है। क्या करें कि जुनून बना रहे?
वक्ता: दो बातें हैं। पहली बात तो यह कि तुम जिस भी चीज़…

प्रश्न: सर, मैं आदर्श कैसे बनूँ?
वक्ता: देखो छोटा वाला आदर्श बनोगे तो आप को लग जायेगा ४-५ साल। बड़ा वाला आदर्श बनने लिए आपको चाहिए बीस साल। और पूर्णतः आदर्श बनने के लिए चाहिए करीब ४०-५० साल। कौन सा वाला चाहिए? पूर्णतः आदर्श? हमने यह जाना है कि ४…

*वक्ता:* आर्येन्द्र का सवाल है कि कुछ काम किया और असफलता मिली, तो मन में कुछ ऐसी गाँठ बन गयी है कि आगे भी काम करेंगे तो सफलता मिलेगी या नहीं, पता नहीं। मन में बात बिलकुल जम कर बैठ गयी है। असफलता गहरे छोड़ गयी है। कितनों…

वक्ता: रवि का सवाल है कि आज तक तो मैंने ज़िन्दगी में यही देखा है कि मेरी सारी प्रेरणा (मोटीवेशन) बाहर से ही आई है l कोई बाहरी व्यक्ति आता है ,मुझे कुछ बोलता है और उससे मैं उत्साह से भर जाता हूँ l और मैंने यही देखा है…



Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…


पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक तरफ़़ तो फ़िल्में हमें मनोरंजन देती हैं, हँसाती हैं, रुलाती हैं और दूसरी ओर उसी इंडस्ट्री से दुःखद और चौका देने वाली खबरें भी आती रहती हैं। कुछ कहिए।








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\n\n29 अप्रैल से 1 मई, 2022 तक आयोजित हुए वेदांत महोत्सव के एक प्रतिभागी की प्रेरणास्पद कहानी\n\nमेरा नाम राकेश कुमार है। मैं कानपुर नगर से हूँ। पिछले चार माह से मैं हर…





प्रश्नकर्ता: अभी आप कह रहे थे कि श्रीकृष्ण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और बाकी सब लोग अपने बारे में बोले जा रहे हैं। तो क्या इसका सम्बन्ध इससे है कि श्रीकृष्ण का कर्मफल और प्रारब्ध कट चुका है लेकिन बाकी सभी का कर्मफल और प्रारब्ध अभी जारी

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
आचार्य…
वक्ता: दीप,…
This article is related to restlessness.
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो हमें इस धारणा से बाहर आना होगा कि फ़िल्में हमें मात्र मनोरंजन…
अब देखिएगा, क्या हो रहा है। कोई कृतज्ञ कब अनुभव करेगा? जब पहले उसकी हालत ख़राब हो और कोई बचाए। आपके भीतर अभी यह इच्छा शेष है कि आप कृतज्ञ अनुभव करती रहें और कृतज्ञता अनुभव करने के लिए ज़रूरी है कि कुछ गड़बड़ हो और फिर उस गड़बड़ से आप उबार ली जाएँ। तो फिर आप कृतज्ञ अनुभव करेंगी कि, अरे, मेरा सौभाग्य कि मुझे किसी ने बचा लिया।
कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।
प्रश्नकर्ता: कृष्ण अध्याय नौ में बताते हैं कि वे सब भूतों में समभाव से व्यक्त हैं, वहीं अध्याय दस में बताते हैं कि जो कुछ भी विभूतियुक्त, कांतियुक्त और शक्ति युक्त है, वो कृष्ण की अभिव्यक्ति है। अध्याय नौ में कृष्ण कहते हैं कि ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद मैं ही हूँ…
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।।
जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है, वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९
प्रश्नकर्ता: जब…
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। आज का सबसे पहला प्रश्न जो है वह सनातन के ऊपर है कि सनातन माने क्या? और ऐसा क्या है जिसको वास्तविक रूप में सनातन कहा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, सनातन का अर्थ होता है वो जो काल की सीमाओं से के बाहर का हो।…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अर्जुन कहते हैं कृष्ण से कि ‘धृतराष्ट्र पुत्र चाहे मुझे मार भी दें तो भी उनसे लड़ना तो ग़लत ही है।‘ हमारे आम जीवन में भी ऐसे ही चलता रहता है कि हम इमोशनल ब्लैकमेल (भावनाओं से किसी को नियंत्रित करना) करते हैं बहुत बार, या…
प्रश्नकर्ता: कुछ दिन पहले आपने एक उदाहरण दिया था, एम एच ३७० का, कि हम जो खोज रहे हैं वो हमें कहीं मिल नहीं रहा इसलिए यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड) इतना बड़ा है कि लगातार हम खोजते जा रहे हैं। तो स्पेस (स्थान) की तो बात उससे समझ में आ रही है।…
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०
आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के…

आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण की निकटता सीखनी है अर्जुन से; अर्जुन के भीतर का कोहरा उधार नहीं ले लेना है। और हमारी हालत ज़बरदस्त है, हमारे पास वो सब कुछ है जो अर्जुन के पास है, बस एक चीज़ नहीं है। हम हर मायने में अर्जुन हैं, अर्जुन का पूरा नर्क…

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
"तो कुल क्षय से होने वाले दोष को देख-सुन कर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ३९
आचार्य प्रशांत: इसी आशय के तर्क आगे भी…

आचार्य प्रशांत: देखिए, बात को समझिए। गीता, सांख्ययोग में, शुरू के कुछ श्लोकों के बाद से भी आरम्भ हो सकती थी। पहला अध्याय तो पूरा ही अर्जुन के विषाद का निरूपण है और दूसरे अध्याय के भी कुछ आरंभिक श्लोकों में अर्जुन की ही व्यथा है। कृष्ण की ज्ञानवर्षा तदोपरांत…

आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता, प्रथम अध्याय, अर्जुन विषाद योग। देखेंगे कि श्रीकृष्ण अर्जुन के सब भावुक, मार्मिक वक्तव्यों को किस प्रकाश में देख रहे हैं। तो अपनी ही मोहजनित पीड़ा को आगे अभिव्यक्त करते हुए अर्जुन कहते हैं:
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: |
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥
यद्यपि ये…