तुम्हारे भी मन की भूख नहीं मिटती? || आचार्य प्रशांत, कबीर साहब पर (2021)

आचार्य प्रशांत: प्रकाश से आशय होता है — वस्तुओं का संज्ञान। प्रकाश न हो तो ऑंखें किसी भी वस्तु का संज्ञान नहीं ले सकतीं; और जब प्रकाश होता है तो प्रकाश स्वयं नहीं देखा जाता, प्रकाश में वस्तु देखी जाती है। तो जैसे हम हैं, हमारे लिए वस्तु तभी है जब प्रकाश है। अभी मैं नेत्रों के सीमित संदर्भ में बात कर रहा हूँ।
आँखों के लिए संसार सिर्फ़ तभी है जब रोशनी है। रोशनी नहीं है तो कम-से-कम आँखों के लिए संसार नहीं है। हाथों के लिए हो सकता है, शायद आप छू सकते हों किसी चीज़ को, आँखों के लिए कुछ नहीं है। तो प्रकाश क्या है? प्रकाश सूचक है वस्तु का, प्रकाश माने वस्तु और वस्तु माने संसार। तो जहाँ प्रकाशित इकाइयों की बात हो रही है — जैसे चंद्र, सूरज, अग्नि, बिजलियाँ — तो उनसे क्या आशय हुआ? संसार। दोहराता हूँ, जब आप प्रकाश की बात करते हैं तो संदर्भ आँखों का होता है न, कान का तो होता नहीं, कान के लिए तो प्रकाश की कोई महत्ता नहीं।
आँखों के लिए प्रकाश क्या है? आँखों के लिए प्रकाश अपनेआप में स्वाधीन रूप से कोई महत्वपूर्ण चीज़ नहीं हो सकती; क्योंकि प्रकाश स्वयं देखा नहीं जा सकता। प्रकाश एक माहौल है, प्रकाश एक माध्यम है जिसमें चीज़ें देखी जाती हैं। जब प्रकाश किसी वस्तु पर पड़ता है तो उस वस्तु से टकरा कर आपकी आँखों पर आता है; फिर वो आपकी आँखों से भी टकराता है। पहले वो किससे टकराया? जिस चीज़ पर पड़ा, उस चीज़ से टकराने के बाद वो किससे टकराया? आपकी आँखों के परदे से टकराया।
इस तरह से प्रकाश उस चीज़ और आपकी आँखों के बीच का पुल बन गया। तो प्रकाश की अपनेआप में कोई महत्ता नहीं है, उसकी महत्ता यही है कि प्रकाश पुल बनकर उस चीज़ को आप तक ले आया, तो महत्ता फिर किसकी हुई? उस चीज़ की, प्रकाश तो माध्यम मात्र है। प्रकाश माध्यम मात्र है संसार को आँखों तक लाने का। तो जब कहा जाता है 'प्रकाश', तो आशय संसार से है। क्योंकि प्रकाश माने वस्तु, जिस वस्तु पर प्रकाश पड़कर आप तक आ रहा है, और वस्तु माने संसार। वस्तुओं के समूह को ही संसार कहते हैं।
ये जितनी चीज़ें हैं जो चेतना का विषय हैं, इनमें परमात्मा नहीं समाया हुआ है। इनसे नहीं है परमात्मा। न तो ये परमात्मा को घेरे हुए हैं, न ही इनसे परमात्मा का उद्भव है; बल्कि उल्टी बात है — परमात्मा है तो ये चीज़ें हैं।


