वक्ता: बात न स्मार्ट वर्क की है, न हार्ड वर्क की है। ध्यान से समझना। बात
कार्यकर्ता की है। हम सतह पर अटक कर रह जाते है जब हम पूछते हैं कि स्मार्ट वर्क और हार्ड वर्क में अंतर क्या है? तुम्हारा क्या नाम है?
श्रोता: दीप।
वक्ता: दीप, हाँ। अब वेंकटेश को, दीप की मान लो हत्या करनी है। अगर वो हार्ड वर्कर है, तो बिलकुल बेकार चाकू लेगा, जिसमे धार ही नहीं है। जिससे आलू-प्याज भी न कटे। और मेहनत कर करके, उसको मारेगा। घंटो लगेंगे। वो चाकू घिस रहा है, घिस रहा है। सामने वाला मर ही नहीं रहा। और अगर वो स्मार्ट वर्कर है, तो जेब से साइनाइड की एक कैप्सूल निकालेगा और धीरे से उसको चटा देगा। बहुत स्मार्ट डेथ हो जाएगी। किसी को पता भी नहीं चलेगा कि मर गए। मरने वाले तक को पता नहीं चलेगा कि मर गए। इतनी *स्मार्ट डेथ*। पर दोनों ही स्थितियों में कार्यकर्ता तो एक ही रहा। हिंसा से भरा हुआ। क्रोध से भरा हुआ। द्वेष से भरा हुआ। बात समझ रहे हो? मूल प्रश्न यह नहीं है कि स्मार्टली मारा या अन-स्मार्टली मारा। प्रश्न यह है कि कार्यकर्ता का चित्त कैसा था? कार्य नहीं कार्यकर्ता। कर्म नहीं कर्ता।
कर्म तो हज़ार तरीके से हो सकता है। कुशल-अकुशल यह विधि, वो विधि। यह रास्ता, वो रास्ता। पर चाहे चल के पहुंचे, या उड़ कर पहुंचे। और चाहे सुरंग से पहुंचे। दिल्ली से ही चले, तो बम्बे तक तो पहुंचे। क्योंकि चित्त तो बम्बई पहुचने में अटका हुआ था। चित्त तो बम्बई पहुँचाने में ही अटका हुआ था। कार्यकर्ता तो क्रोध और हिंसा से ही भरा हुआ था। करनी तो उसे हत्या ही थी। कोई कार्य


