अतीत की असफलताओं का क्या करूँ? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

*वक्ता:* आर्येन्द्र का सवाल है कि कुछ काम किया और असफलता मिली, तो मन में कुछ ऐसी गाँठ बन गयी है कि आगे भी काम करेंगे तो सफलता मिलेगी या नहीं, पता नहीं। मन में बात बिलकुल जम कर बैठ गयी है। असफलता गहरे छोड़ गयी है। कितनों के साथ ऐसा हुआ है कि पुरानी असफलताएं अभी भी याद आती हैं?
(सभी हाथ उठाते हैं)
तो सिर्फ आर्येन्द्र का सवाल नहीं है। लगता है बहुतों का सवाल है। पुरानी असफलता कहाँ है? जिस पुरानी असफलता को तुम याद कर रहे हो वह है कहाँ पर? अभी तुम यहाँ बैठे हो, मैं कुछ कह रहा हूँ उसे सुन रहे हो, इसमें वह पुरानी असफलता है कहाँ? हाँ एक नयी असफलता ज़रूर पैदा हो जाएगी अगर तुम इस वक़्त भी उस ही पुराने को सोचते रहोगे।
जो पुराना दिन बीत जाता है वह पूरी तरह बीत जाता है। वह अपने कोई निशान छोड़कर नहीं जाता। अस्तित्व को देखो, दुनिया को देखो,जो बीत गया वह बीत ही गया। अब उसका कुछ भी बचा नहीं है।
लेकिन हमारा जो मन है वह उसको पकड़ करके बैठा रहता है। सिर्फ असफलता को ही नहीं सफलता को भी पकड़ कर बैठा रहता है। जब मैं कह रहा हूँ कि पुरानी असफलता कहाँ बची है तो मैं तुमसे यह भी कह रहा हूँ कि पुरानी सफलता कहाँ बची है? और मेरे लिए सफलता की बात करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि तुम्हे असफलताएं याद ही इसलिए रहती है क्योंकि तुम्हे बहुत शौक है अपनी सफलताओं को याद रखने का। उस से अहंकार को बड़ी ताकत मिलती है कि मैं सफल था। अब याद तो तुम रखना चाहते थे अपनी सफलता, वह मिली नहीं पर जो मिल गया वह याद रखा है क्योंकि तुमने जगह तो बहुत सारी बना ही दी थी कि इसमें हम याद रखेंगे।
जो असफलताओं के पार जाना चाहता हो, उनसे मुक्ति चाहता हो, उसे सफलताएं भी भूलनी पड़ेंगी।

