प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। यूट्यूब है, और यूट्यूब पर कितनी ही कोशिश करें, कितने ही वक्ता, प्रवक्ता, कथावाचक, मोटिवेशनल स्पीकर्स सामने पड़ ही जाते हैं। कई सारे लोग हैं जो 'जीवन में काबिल कैसे बनें', 'सफल कैसे बनें' इन सब विषयों पर बहुत बाते करते हैं। उनको सुनकर लगता है कि, हाँ, मन का एक कोण है जो इनको सुनने में भी रस पा रहा है, उसको अभी भी यह विश्वास है कि इनको सुनूँगा तो शायद सफल, सार्थक, काबिल हो ही जाऊँ। पर उनमें राम नहीं दिखते, अध्यात्म की झलक बिलकुल नहीं दिखती। जब आपको सुनता हूँ तो सर्वत्र हर वीडियो में राम ही मौजूद पाता हूँ। क्या मुझे उनको सुनना त्याग देना चाहिए? क्या मन का वो जो कोण है जो सफलता और काबिलियत के पीछे भाग रहा है उसको किनारे कर देना चाहिए, और राम में ही डूब जाना चाहिए? इस विषय पर कृपया मुझे स्पष्टता दें।
आचार्य प्रशांत: स्पष्टता क्या दें। दुनिया में हर तरह के व्यंजन मौजूद हैं। कोई भी खाद्य सामग्री अपने-आपमें सही या गलत तो होती नहीं न। वो तो निर्भर इस पर करता है कि खाने वाला कौन है।
पहले मन कागा था, करता आतम घात। अब मनवा हंसा भया, मोती चुन-चुन खात।। ~गुरु कबीर
तो विष्ठा भी है और मोती भी है। न टट्टी में अपने-आपमें कोई बुराई है, न मोती में अपने-आपमें कोई अच्छाई है। निर्भर इस पर करता है कि तुम कौन हो। तुम कौवे हो तो मोती का करोगे क्या? और हंस हो गए अगर तुम, तो विष्ठा की तरफ तुम्हारी दृष्टि जाएगी ही नहीं।
भाई तुमने बात की तमाम तरह के वक्ताओं की और ये सब। बहुत लोग हैं जो उनको सुन रहे हैं। कुछ उनको मज़ा आता होगा, कुछ लाभ दिखता होगा तभी सुन रहे हैं न? तुम अगर उनमें से एक हो जिन्हें अभी वहाँ पर लाभ दिखता है, तो उनको सुनते रहो। कुछ होता होगा लाभ भाई।

