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ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…


प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी,। आप से जुड़ा था। तबजब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरीमेरे साथ श्रीमती जी भी आईं हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था…

आचार्य प्रशांत: पूछा है कि, "कबीर साहब कह गए हैं कि;
कोटि नाम संसार में, तासे मुक्ति ना होए। आदि नाम जो गुप्त है, बूझे बिरला कोए।। ~कबीर साहब
तो इसमें किस नाम की बात हो रही है? फिर आगे कहते हैं कि ऐसे ही तुलसीदास कह गए हैं कि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी को प्रणाम। आचार्य जी, कबीर दास जी कहते हैं , "लूट सको तो लूट लो, राम नाम की लूट। पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाएँ जब छूट।" तो राम नाम की लूट से क्या आशय है? कृपया प्रकाश डालें और प्रणाम स्वीकार करें।
आचार्य प्रशांत: कपिल (प्रश्नकर्ता), जीवन…

प्रश्नकर्ता: सर, कोई आदमी कब सुसाइड (आत्महत्या) करने के बारे में सोचने लगता है? हम लोगों के दिमाग में तो आता भी नहीं है यह ख़याल।
आचार्य प्रशांत: यह किसके दिमाग में आया अभी-अभी?
प्र: कुछ लोग मर जाते हैं

खसम उलटि बेटा भया, माता मिहरी होय।
मूरख मन समुझै नहीं, बड़ा अचम्भा होय।।
~ कबीर साहब

कहता हूँ कहि जात हूँ, कहा जु मान हमार।
गल तुम काटि हो, सो फिर काटि तुम्हार।।
~ संत कबीर

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर। ।
~गुरु कबीर
प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम। कृपया गुरु कबीर की इन पंक्तियों का आशय स्पष्ट करें।

प्रश्न: आचार्य जी, नमन।
कबीर दास जी का एक दोहा है –
सभी कर्म हमारो किया, हम कर्मण ते न्यारे हो

प्रश्न:
कबिरा यह मन लालची, समझे नहीं गंवार।भजन करन को आलसी, खाने को तैयार।।
~ गुरु कबीर

चकमक पत्थर रहे एक संगा, नहीं उठे चिंगारी।
बिनु दया संयोग गुरु बिनु, होत नहीं उजियारी।।
~ संत कबीर साहिब

लकड़ी जल डूबे नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।
अपनी सीची जानि के, यहीं बड़ने की रीति।।
~ गुरु कबीर

*साधो भाई जीवत ही करो आसा।***
*जीवत समझे, जीवत बुझे,* *जीवत मुक्तिनिवासा।*
*जीवत करम की फाँस न कटी,* *मुये मुक्ति की आसा।*

गगन दमदमा बाजिया, पड़ेया निसानी घाव।खेत बुहारया सूरमा, मुझे मरण का चाव।।
~ कबीर
आचार्य प्रशांत: जब कबीर गगन की, आकाश की बात करते हैं, तो उनका आश्य होता है मन का आकाश, चिदाकाश। वो बात कर रहें हैं कि जो आपका आतंरिक आकाश है, वहाँ पर ध्वनि हो

जो तू चाहे मुक्त को, छोड़ दे सब आस|
मुक्त जैसा ही हो रहे, सब कुछ तेरे पास||
~ कबीर

सुख सागर का शील है, कोई न पावै थाह।
सुख सागर का शील है, कोई न पावै थाह।
शब्द बिना साधू नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह।।

निन्दक तो है नाक बिन, सोहै नकटी माहि। साधुजन गुरुभक्त जो, तिनमे सोहै नाही॥
निन्दक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥
~ गुरु कबीर

जाके जौन स्वाभाव, छूटे नहीं जीव सो,
नीम ना मीठी होय, सींचै गुड़ घीव सो।।
संत कबीर

उमरिया धोखे में खोये दियो रे पाँच बरस का भोला भला, बीस में जवान भयो। तीस बरस में माया के कारण, देश-विदेश गयो। उमर सब धोखे में… चालीस बरस अंत अब लागै, बाढ़ै मोह गयो। धन धाम पत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।। बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत…

हाथ सुमरनी पेट कतरनी, पढ़त भागवत गीता ।
राम भजा सो जीता जग में, राम भजा सो जीता ।।
संत कबीर

कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिए कोय|
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय||
~संत कबीर

दुःख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै, तो दुःख काहे को होय।।
संत कबीर

आशा तो गुरुदेव की, दूजी आस निरास।
पानी में घर मीन का, क्यों मरे पियास।।
कबीर

कबीरा जब पैदा हुए तो जग हँसा हम रोये
ऐसी करनी कर चलो कि हम हँसे जग रोये
सात जन्म के सात फेर हैं

सन्त पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह|
लखा जो चाहे अलख को, उन्हीं में लख लेह||

वक्ता: दो बातें हैं। पहली, योग है। दूसरी, अनंत समय है।
“युगन युगन हम योगी।” और ये दोनों ही बातें जब एक साथ कह दी जाती हैं, तो पूर्ण कह दिया जाता है। योग का अर्थ है: केंद्र। ‘अनंत समय’ का अर्थ है: उस केंद्र से फैला हुआ पूरा विस्तार।…

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ।।
~ संत कबीर
प्रश्नकर्ता: इस दोहे को जब मैं अपने जीवन के सन्दर्भ में देखती हूँ तो पाती हूँ कि मेरे सारे प्रयत्न, जवाबों को ढूँढने की राह में कम ही पड़ते हैंI अपने प्रयासों को

वक्ता: एक तरफ़ तो ये कहा गया है कि प्राप्ति, उपलब्धि तत्क्षण है। जो समयातीत है, उसे समय का उपयोग करके नहीं पाया जा सकता। भविष्य में आगे देखना, कल्पना करना कि, ‘’किसी मार्ग के द्वारा, किसी विधि के द्वारा मैं शान्ति को, मुक्ति को पाउँगा, ये सिर्फ़ आपकी…

बिरहिन ओदी लाकड़ी, सकुचे और धुन्धाये ।छुटी पड़ी यह बिरह से, जो सगरी जली जाये ।।
~ संत कबीर
वक्ता: नियति तो उसकी जलना ही है। और नहीं जलेगी तो इतना ही करेगी कि, खूब धुआं देगी। कोई रोशनी नहीं, कोई ऊष्मा नहीं, सिर्फ़ धुआं। गंदगी फैलाएगी। जलेगी,

साधु गाँठ न बाँधई, उदर समाता लेय ।
आगे पाछे हरि खड़े, जब माँगे तब देय ।।
~संत कबीर

“श्रम से सब कुछ होत है,बिन श्रम मिले कुछ नाहीं।
सीधे उंगली घी जमो,कबसू निकसे नाहीं।“
~ संत कबीर

कबीर क्षुधा कूकरी, करे भजन में भंग
वाकूं टुकड़ा डारि के, सुमिरन करूँ सुरंग
~ संत कबीर

ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: बड़ी ग़लती कर देते हैं हम, हमें लगता है कबीर कह रहे हैं - ऐसी वाणी बोलिये जिससे मन का आपा खो जाए, नहीं। कबीर कह रहे हैं - ऐसी वाणी

धरती फाटे, मेघ मिलै, कपडा फाटे डौर,
तन फाटे को औषधि, मन फाटे नहिं ठौर।
~ संत कबीर

सोना, सज्जन, साधुजन, टूट जुड़े सौ बार
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एकै धक्का दरार
~ संत कबीर

सोया साधु जगाइए, करे नाम का जाप ये तीनो सोते भले, साकट सिंह और साँप
-संत कबीर
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिकता के प्राथमिक सूत्रों में ही यह है कि संत जो भी कहे, उस बात को संसार का नहीं मन का जानो, भले ही उसमें जो दृष्टांत दिया गया हो, वो

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥
– कबीर

राम बिनु तन को ताप न जाई
जल में अगन रही अधिकाई
राम बिनु तन को ताप न जाई

पंडित और मशालची, दोनों सूझत नांहि
औरन को करै चांदना, आप अँधेरे मांहि
संत कबीर

अवधूता गगन घटा गहरानी रे।।
पच्छम दिसा से उलटी बादली, रुमझुम बरसे मेहा,
उठो ज्ञानी खेत संभारो, बह निसरेगा पानी।।१।।

सौ बरसा भक्ति करे, एक दिन पूजे आन ।
सौ अपराधी आत्मा, पड़े चौरासी खान ।।
~संत कबीर

गुरु नारायन रूप है, गुरु ज्ञान को घाट। सतगुरु बचन प्रताप सों, मन के मिटे उचाट।। ~ संत कबीर
प्रश्नकर्ता: सर, हम छात्रों को जवाब देते हैं, तो मौका मिल रहा है, आप जैसा बनने का। मन में बड़ी हलचल सी मची है इस बात को लेकर, कुछ कहें।
आचार्य…

शून्य मरे, अजपा मरे, अनहद हूँ मरी जाय।
राम सनेही ना मरे, कहे कबीर समझाय।।
~ संत कबीर

नाहं देहो न मे देहो, जीवो नाहमहं हि चित्।
अयमेव हि मे बन्ध् आसीध्या जीविते स्पृहा।।
–अष्टावक्र गीता

नारि पुरुष की इसतरी, पुरुष नारि का पूत।
याही ज्ञान विचारि के, छाडि चले अवधूत।।
~ संत कबीर

मन मते माया तजि, यूँ करे निकस बहार।
लागी रही जानी नहीं, भटकी भयो खुआर।।
संत कबीर
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.
आचार्य: बेटा, हर आदमी लगातार दुःख से…
खसम उलटि बेटा भया
'खसम' का अर्थ हुआ जिसको तुमने स्वामी का स्थान दिया, और 'बेटा' हुआ स्वामी को स्वामित्व देने का…
आचार्य प्रशांत जी:
एक ही है जो बड़ा है, जो वृहद है, उसे ‘ब्रह्म’ कहते हैं। उसके…
आचार्य प्रशांत जी: ये कबीरों की, संतों की अपनी आंतरिक स्थिति है, अपनी कहावत है। कह रहे हैं, “ऊपर-ऊपर से प्रतीत होता है कि…
श्रोता: आग जलाने के काम आता है।
आचार्य प्रशांत: ठीक है!
चकमक पत्थर रहे एक संगा।
अकेला है वो। वो कह…
*अबहूँ मिला तो…
आचार्य जी: दो तरफा प्रयोजन है यहाँ पर कबीर का, शब्द से। एक तो गहरी परीक्षा साधू…
आचार्य प्रशांत: निंदक तो है नाक बिन। नाक से अर्थ है—मान, कीमत। उसकी अपनी कोई कीमत नहीं होती है। उसकी…
आचार्य प्रशांत: यहाँ पर कबीर जिस स्वभाव की बात कर रहे हैं,…
श्रोता१: भजा तभी जा सकता है जब उस चीज़ को समझ सको।
श्रोता२: भजा मतलब एक पूरी मौजूदगी इन्वॉलव्ड है।…
माया तो ठगनी भयी, ठगत फिरत सब देश|
जा ठग ने ठगनी ठगी, ता ठग को आदेश||
मुक्ति सर्व आयामी और…
जम का दंड मुंड पे लागे
धरी रहे चतुराई
कबीरा जब पैदा हुए तो जग हँसा हम रोये
ऐसी करनी कर चलो…
वक्ता: संत कौन है? संत पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह, लखा जो चाहे अलख को, उन्हीं में लख जे लेह| संत कौन है? संत वो है जिसने अपनी हर…
सवाल यह है कि कबीर श्रम की महत्ता पर इतना ज़ोर दे रहें हैं, और आपने बार-बार कहा है कि श्रम की कोई कीमत…
वक्ता:संवेदनशीलता का अर्थ ही यह है कि ‘मैं’ बीच में न आए। जहाँ ‘मैं’ बीच में आ जाता…
जल में रहि जलहि बिनु जीना
राम बिनु तन को ताप न जाई
तुम पिंजरा मैं सुवना तोरा
दरसन देहु भाग बड़ मोरा
राम बिनु तन…
दुबध्या डूब जन्म नहीं पावे, बोवो नाम की धानी।।२।।
चारों कोनें चार रखवाले, चुग न जावे मृग धानी,
काटया खेत मींड़ा…
माया के नाम पर लोग क्या तजते हैं? ये खाऊंगा नहीं, ये पहनूंगा…