डरो नहीं, तुम सुरक्षित हो || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2017)

लकड़ी जल डूबे नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।
अपनी सीची जानि के, यहीं बड़ने की रीति।।
~ गुरु कबीर
आचार्य प्रशांत: “लकड़ी जल डूबे नहीं, कहो कहाँ की प्रीति” — सवाल उठा रहे हैं कबीर, यह कौन सा प्रेम है, यह किसका प्रेम है, क्या प्रकार है इसका कि एक निराश्रित, छोटी, कण बराबर, बेसहारा लकड़ी इतने बड़े विराट समुद्र में तैरती जाती है, तैरती जाती है, डूबती नहीं? डूबने से अर्थ है कि उसका कुछ बिगड़ता नहीं, विनिष्ट नहीं हो जाती, यह कैसे संभव है? और प्रेम की इससे सुन्दर परिभाषा हो नहीं सकती कि अपने आपको छोड़ दिया है ‘विराट’ के हवाले, कि रख लेगा मेरा वो ध्यान।
प्रश्नकर्ता: आजतक उसी ने सींचा है, आजतक वही सींचता आया है, तो रख लेगा ध्यान। “अपनी सींची जानि के”।
आचार्य: “अपनी सीची जानि के, यहीं बड़ने की रीति”। तो कहाँ की प्रीती? यही बड़ने की रीति। यही अस्तित्व की रीति है कि जो तैरने लग जाते हैं वो नहीं डूबते, कि जो ‘बहना’ सीख लेते हैं उनका ‘डूबना’ बंद हो जाता है।
प्र१: जो मौजी हो गए। जो हलके हो गए।



