चकमक पत्थर रहे एक संगा, नहीं उठे चिंगारी।
बिनु दया संयोग गुरु बिनु, होत नहीं उजियारी।।
~ संत कबीर साहिब
आचार्य प्रशांत: चकमक पत्थर। चकमक कौन-सा पत्थर होता है?
श्रोता: आग जलाने के काम आता है।
आचार्य प्रशांत: ठीक है!
चकमक पत्थर रहे एक संगा।
अकेला है वो। वो कह रहा है, “भाई! मुझे किसी से कोई मतलब नहीं है। मैं तो अपनेआप में ही काफ़ी हूँ,” क्योंकि चकमक को बता दिया गया है कि – “आग तो तेरे भीतर ही है।” शायद चकमक ने कबीर साहिब को ही सुन लिया होगा।
*ज्यों तिल माही तेल है, ज्यों चकमक में आग।*तेरा साईं तुझमें है, जाग सके तो जाग।।




