जिसके खालीपन में झलके अनंत, उसी को शून्यवत कहो उसी को संत || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

सन्त पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह|
लखा जो चाहे अलख को, उन्हीं में लख लेह||
~संत कबीर
वक्ता: संत कौन है? संत पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह, लखा जो चाहे अलख को, उन्हीं में लख जे लेह| संत कौन है? संत वो है जिसने अपनी हर विशिष्ठता खो दी है| संत वो है जो अब अति साधारण हो गया है, जिसमे कुछ विशेष नहीं बचा है|
जो निर्विशेष हो गया, वो ही संत है|
निर्विशेष हो जाने का मतलब है, नमक का समुद्र में पूरी तरह से घुल जाना| निर्विशेष हो जाने का मतलब है बादल का आसमान में पूरे तरीके से छंट जाना| उसकी अपनी कोई सत्ता अब बची नहीं| तो वो क्या है अब? उसकी अपनी कोई सत्ता नहीं है, उसका अपना कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है, वही संत है| जिसका कुछ भी अब व्यक्तिगत नहीं रहा, सो संत|
न वहाँ पर्सन मिलेगा, ना पर्सनेलिटी मिलेगी| व्यक्तिपरक कुछ मिलेगा ही नहीं, वही संत है| कुछ विशेष नहीं मिलेगा, कोई ऐसा गुण-धर्म नहीं मिलेगा जिसको इंगित कर के कह सको कि ये इनकी ख़ास पहचान है| कुछ उसमे ख़ास होगा ही नहीं, कोई उसकी विशिष्ट लक्षणा पाओगे ही नहीं| कभी ऐसा भी होगा, कभी वैसा भी होगा, निरंतर परिवर्तनीय| जिन सब बातों को हम बड़प्पन का, विशिष्टता का सूचक मानते हैं, बड़ी संभावना है कि वो संत में दिखाई ही न दे|




