डूब के जानो, झूम के गाओ || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

सुख सागर का शील है, कोई न पावै थाह।
सुख सागर का शील है, कोई न पावै थाह।
शब्द बिना साधू नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह।।
~कबीर
आचार्य जी: दो तरफा प्रयोजन है यहाँ पर कबीर का, शब्द से। एक तो गहरी परीक्षा साधू की वो होती है जहाँ पर वो इतना मौन हो सके कि उसको सत्य सुनाई देने लगे। इतना मौन हो जाना, इतना मौन हो जाना कि सत्य ही सुनाई दे – वही अनहद की आवाज है।
और उसके बाद दूसरी परीक्षा होती है उस मौन को सतत कायम रखने की ताकि जो सुना है वो वचन रूप में सामने भी आ सके। एक क्षण, दो क्षण को तो ऐसे मौके हम में से बहुतों को मिलते हैं जब अकस्मात ही बात खुल जाती है, सत्य बिलकुल नंगा, बिलकुल स्पष्ट, हमारे सामने खड़ा हो जाता है; वो अनुकम्पा के क्षण होते हैं। अर्जित नहीं किया होता हमने उनको, बस मिल जाते हैं। मिल जाते हैं, और फिर खो भी जाते हैं। जैसे आए थे, अनायास, वैसे ही चले भी जाते हैं, अनायास। क्योंकि देने वाले ने देना चाहा था, पर स्वीकार करने की अभी हमारी तैयारी ही नही थी। तो, दिखता तो है, पर दिखता रहता नहीं। स्पष्ट तो होता है, पर वो स्पष्टता बड़ी क्षणभंगुर है।



