गगन दमदमा बाजिया, पड़ेया निसानी घाव।खेत बुहारया सूरमा, मुझे मरण का चाव।।
~ कबीर
आचार्य प्रशांत: जब कबीर गगन की, आकाश की बात करते हैं, तो उनका आश्य होता है मन का आकाश, चिदाकाश। वो बात कर रहें हैं कि जो आपका आतंरिक आकाश है, वहाँ पर ध्वनि हो रही है। जो ये दमदमा बज रहा है, ये और कुछ नहीं है, ये अनहद नाद है। एक ही शब्द है जो उस गगन में बज सकता है, वो नि:शब्द का नाद है।
मन भरा रहता है, आवाज़ों से, शोर से, शब्दों से और ये सब बाहरी होते हैं। जब तक मन में बाहरी ध्वनिया रहती हैं तब तक उसकी अपनी आवाज़ छुपी-छुपी सी ही रहती है। फिर कोई ऐसा भी होता है जिसकी ऐसी भी स्थिति आती है कि बाहर के सारे प्रभावों से वो खाली हो लेता है। वो अपने को और बाहर को अलग जान लेता है। उसके लिए संभव हो पाता है ये भेद कर पाना कि मैं बाहरी नहीं हूँ। अब वो ‘बाहरी प्रभावों’ का और ‘बाहरी शोर’ का भी ग़ुलाम नहीं रह जाता। जिसका मन बाहरी से खाली हो लिया वो फिर अपना अंतर नाद भी सुन पाता है। ऐसे के लिए ही कह रहें हैं कबीर कि “गगन दमदमा बाजिया।” कहने को तो वो मौन की ध्वनि है। कहने को तो वो नि:शब्द है। लेकिन जो सुनते हैं, उनके लिए वो किसी नगाड़े से कम नहीं है। किसी दमदमे से कम नहीं है।
बाहर के प्रभावों में बहोत दम है ये तो हम अकसर कहते रहते हैं। बाहर की आवाज़ें हम पर हावी हो जाती हैं ये भी हमने बहोत अनुभव करा है। लेकिन जो उस नाद को सुनते हैं सिर्फ़ वही जानते हैं कि जिसने उसको सुन लिया, अब उसके सामने कोई विकल्प नहीं रह जाता। इतनी ताकतवर आवाज़ है उसकी। फिर दुनिया भर की सौ आवाज़ें चाहे वो कहीं से आ रहीं हों, दुनिया भर की सौ आवाज़ें भी आपको अपनी तरफ आकृष्ट नहीं कर सकती हैं अगर चिदाकाश में उठती वो




