धरती फाटे, मेघ मिलै, कपडा फाटे डौर,
तन फाटे को औषधि, मन फाटे नहिं ठौर।
~ संत कबीर
वक्ता: धरती फट गई हो, ऐसा ताप पड़ा हो कोई वर्षा न हुई हो और धरती फट उठी हो। तो इलाज संभव है। मेघ आएगा और सींच देगा। फटी धरती दुबारा नम हो जाएगी। बड़ी समस्या नहीं है कोई। पदार्थ की बात है, पदार्थ ही आ करके हल कर देगा। ‘*कपडा फाटे डौर*’-फट गया है कपड़ा, तो सुईं, धागा, डोरी, काम हो जाएगा। फिर कोई बड़ी समस्या नहीं है। ‘तन फाटे को औषधि’– यहाँ भी पदार्थ की बात है। औषधि आएगी, ठीक कर जाएगी। तन का रोग है, व्याधि चली जाएगी औषधि से। ‘मन फाटे नहिं ठौर’, पर मन अगर फट गया, मन अग टुकड़ा-टुकड़ा, खंड-खंड हो गया, तो कहाँ ठिकाना पाओगे? कोई सुईं-धागा तुम्हारे काम नहीं आएगा।
मन का फटना समझते हो? मन का फटना क्या? फटा मन कैसा होता है?
श्रोता: बंटा हुआ, विरोधाबास..
वक्ता: हाँ। बढ़िया। और विरोधाबास चारों तरफ हैं, उनको हम क्या बोलते हैं..? जहाँ विरोध ही विरोध है, और बिना विरोध के कुछ हो ही नहीं सकता? द्वैत।






