जीव के लिए ही मृत्यु है || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

नाहं देहो न मे देहो, जीवो नाहमहं हि चित्।
अयमेव हि मे बन्ध् आसीध्या जीविते स्पृहा।।
–अष्टावक्र गीता
वक्ता: यदि देह हूँ मैं, तो जन्म हुआ है मेरा, यदि जन्म हुआ है मेरा तो एक ही मंज़िल है मेरी, मौत। यदि देह हूँ मैं, तो जीवन मात्र एक यात्रा है जन्म से मृत्यु के बीच की। यदि देह हूँ मैं, तो जीवन का अर्थ है इस यात्रा के बड़े-बड़े पड़ाव।
देह होने का अर्थ ही यही है कि समस्त जीवन का एक ही औचित्य रह जाएगा: मौत से बचना क्यूंकि जीवन की निष्पत्ति मात्र मृत्यु ही है देह के लिए। देह और कहीं को जा ही नहीं रही, देह सिर्फ़ मौत की ओर जा रही है और आप मरना नहीं चाहते। अब आप जो कुछ भी करोगे, आप की सांस-सांस में सिर्फ़ मौत का भय होगा। आप अपने आस-पास के संसार को देखिए, उनकी गतिविधियों को देखिए, आप पाएँगे कि सब कुछ सिर्फ़ मौत के भय से चालित है; आप दुनिया के विस्तार को देखिए, आपको उसमें सिर्फ़ मौत का विस्तार दिखाई देगा।
यदि मैं देह हूँ, तो दुनिया शमशान है; यदि मैं देह हूँ तो मैं पैदा भी शमशान में हुआ और जा भी सिर्फ़ शमशान की ओर रहा हूँ। अपने आपको देह मानने का ही अर्थ है कि लगतार एक ऐसी असुरक्षा में जीना, जिससे कोई निजात नहीं है। एक तरफ़ तो मौत का खौफ़ हमें साले डालता है, दूसरी ओर मौत अनिवार्य भी है- ये बड़ी विचित्र स्थति भी है; हमें वो सता रहा है जो अपरिहार्य है, जो होना ही है। यदि देह हैं आप, तो मौत से बचेंगे कैसे? और यदि देह हैं आप, तो मौत से ज़्यादा आपको कुछ सताता नहीं है, तो जीवन नर्क है फिर; आप एक ऐसी मंज़िल की तरफ़ बढ़ते ही जा रहे हैं जिसकी याद भी आपको कंपा देती है; यदि देह हैं आप।



