जो तू चाहे मुक्त को, छोड़ दे सब आस|
मुक्त जैसा ही हो रहे, सब कुछ तेरे पास||
~ कबीर
आचार्य प्रशांत: तो अनु पूँछा है कि ‘मुक्त जैसा ही’ माने क्या? ये बड़ी सुंदर विधि है, जो कबीर ने बताई है और इस विधि का बहुत सारी परम्पराओं में जमके उपयोग हुआ है, अच्छी विधि है। विधि ये है कि हम कहते तो हैं कि सत्य से संसार आया, विधि के मूल में क्या बात है, उसको समझा रहा हूँ, हम कहते तो हैं कि सत्य से संसार आया, पर जब हम कहते हैं सत्य से संसार आया तो उसमे ऐसे प्रतीत होता है, जैसे समय बीच में है, जैसे सत्य पहले था फिर उससे संसार उद्भूत हुआ।
ऐसा है नहीं,
सत्य संसार दोनों एक साथ हैं, दोनों एक साथ हैं।
तो जो पारमार्थिक है और जो भौतिक है, ये दोनों सदा एक साथ हैं, दोनों सदा एक साथ हैं । जो केंद्रीय है, और जो परिधि पर है, वो दोनों सदा एक साथ हैं, आत्मा और शरीर सदा एक साथ हैं, आत्मा और शरीर सदा एक साथ हैं। यदि





