कहता हूँ कहि जात हूँ, कहा जु मान हमार।
गल तुम काटि हो, सो फिर काटि तुम्हार।।
~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: कबीर जो भी कहें, उसमें शब्द भले ही हमारी भाषा के हों, वस्तुएँ भले ही हमारी ज़िंदगी की हों, सारे प्रतीक, सारी उपमाएँ हमारे ही संसार के हों, लेकिन अगर उसका वास्तव में लाभ उठाना है तो कबीर के कहे को कबीर के तल पर ही सुनना चाहिए; यथासंभव सुने पर से अपनी पकड़ छोड़नी चाहिए। देह, जीव, जीवन — इनका हमारे लिए जो अर्थ है, कबीर के लिए उतना ही अर्थ नहीं है इनका। कबीर के लिए देह, भोजन, हिंसा, संसार, जीवन, धर्म, ये सब बड़े व्यापक शब्द हैं, और जितना व्यापक हो करके आप इनको सुनेंगे उतने ही उनके व्यापक अर्थ आपके लिए खुलेंगे।
कहता हूँ कहि जात हूँ, कहा जु मान हमार।
जाका गल तुम काटिहो, सो फिर काटि तुम्हार।।
जिसका गला तुम काट रहे हो, वो फिर तुम्हारा गला काट रहा है। हम अपनेआप को जो समझते हैं, जो जानते हैं, वो काटने के अलावा कुछ और कर नहीं सकता क्योंकि ‘कटा होना’ ही उसका अस्तित्व है। इतना ही कह रहे हैं कबीर कि – दूसरे को काटने के लिए पहले तुम्हें दूसरे से कटना पड़ेगा। दूसरे के साथ कुछ भी करने के लिए, दूसरे को ‘दूसरा’ घोषित भी करने के लिए तुम्हें पहले दूसरे से अपनेआप को काटना पड़ेगा। अब बताओ कटा कौन – दूसरा या तुम? कटाव तो उसी वक़्त हो गया जिस क्षण तुमने ‘दूसरा’ पैदा किया, ‘दूसरा’ घोषित किया, दूसरे को ‘दूसरा’ कहा। अर्थ इसका ये मत कर लीजिएगा कि तुम किसी का यदि गला, इत्यादि काट रहे हो, तो वो पलटकर के आएगा किसी रूप में तुमको कष्ट देने के लिए, तुम्हें परेशान करने के लिए, कि बदले का खेल चलेगा।





